भगवान कल्कि
कथा, जो अभी भविष्यत् काल में लिखी है — 24 अवतार, क्रम 22
भगवान कल्कि
✦ भावी अवतार — श्वेत अश्वारोही ✦
📍 कथा, जो अभी भविष्यत् काल में लिखी है
✨ एक झलक
श्रीमद्भागवत सूचीचौबीस की माला का एकमात्र भावी अवतार — परंपरा के अनुसार कलियुग के अंतिम चरण में, जब सत्य नाममात्र रह जाएगा, तब शम्भल ग्राम में विष्णुयशा के घर भगवान कल्कि रूप में प्रकट होंगे: श्वेत अश्व देवदत्त, हाथ में खड्ग — अधर्म के संगठित तंत्र का अंत कर सत्ययुग का द्वार खोलने वाले। यह भविष्य की धार्मिक मान्यता है — इसकी कोई तिथि-भविष्यवाणी शास्त्र-सम्मत नहीं, किसी जीवित या ऐतिहासिक व्यक्ति को कल्कि कहना परंपरा-विरुद्ध है, और इस कथा का राजनीतिक-सामुदायिक उपयोग इसकी आत्मा के विरुद्ध। कल्कि-मान्यता का हृदय भय नहीं — आशा है: अंधकार कितना भी घना हो, अंतिम नहीं है।
🪷 एक दृष्टि में
🔤 नाम का अर्थ
"कल्कि" की परंपरागत व्युत्पत्तियाँ "कल्क" (मल, पाप-कालिमा) से जुड़ती हैं — कल्कि अर्थात कालिमा का नाश करने वाले; कुछ व्याख्याएँ "कल" (काल/गणना) से जोड़ती हैं — काल-चक्र को नई गति देने वाले। दोनों भाव मिलकर इस नाम का प्रयोजन कह देते हैं: युग-भर की संचित मलिनता का प्रक्षालन। यह नाम किसी व्यक्ति की उपाधि नहीं — भविष्य के उस दिव्य हस्तक्षेप का नाम है जिसकी प्रतीक्षा परंपरा आशा-भाव से करती है।
🌄 कथा की पृष्ठभूमि
पुराण-परंपरा कलियुग के अंतिम चरण का जो चित्र देती है, वह अधर्म के "व्यवस्था बन जाने" का चित्र है — सत्य क्षीण होते-होते नाममात्र; सत्ता और संपत्ति ही योग्यता की कसौटी; धर्म केवल वेश; करुणा दुर्बलता मानी जाएगी; आयु-स्मृति-बल घटते जाएँगे। भागवत के बारहवें स्कंध की परंपरा में कलियुग-लक्षणों का यह वर्णन विस्तार से मिलता है — और उसी अंधकार-चित्र के बीच वह आश्वासन दीपक-सा रखा गया है: तब भगवान कल्कि रूप में प्रकट होंगे।
यह समझना आवश्यक है कि यह "भविष्यवाणी" की शैली भर है — पुराणों की काल-दृष्टि चक्रीय है: सत्य-त्रेता-द्वापर-कलि का चक्र घूमता है, और हर कलि के अंत पर नव-सत्ययुग का द्वार है। कल्कि उस द्वार के द्वारपाल हैं — विनाश के नहीं, नव-आरंभ के प्रतीक। पुराण-गणना में कलियुग की अवधि लक्षों वर्षों की कही गई है — अर्थात परंपरा स्वयं इसे सुदूर भविष्य में रखती है; "निकट अंत" के दावे शास्त्र-सम्मत नहीं।
📖 संपूर्ण अवतार-कथा
ग्रंथ-वर्णित चित्र — शम्भल, विष्णुयशा, देवदत्त
भागवत और विष्णु पुराण की धाराएँ भावी अवतरण का जो संक्षिप्त चित्र देती हैं, वह प्रतीकों से भरा है — शम्भल नामक ग्राम में विष्णुयशा नामक श्रेष्ठ, सद्गुणी ब्राह्मण के घर भगवान कल्कि रूप में जन्म लेंगे। (माता के नाम पर ग्रंथ-भेद है — कल्कि पुराण की परंपरा में "सुमति" नाम मिलता है; भागवत-विष्णु पुराण की मुख्य धारा में पिता-नाम ही प्रमुख है। हम भेद को भेद ही रहने देते हैं।) वे श्वेत अश्व पर आरूढ़ होंगे — परंपरा में जिसका नाम देवदत्त मिलता है — और हाथ में खड्ग धारण करेंगे।
प्रतीकों को पढ़िए, क्योंकि यह कथा प्रतीकों में ही बोलती है। शम्भल — जिसकी परंपरागत भाव-व्याख्या शम् (कल्याण, शांति) से जुड़ती है: नव-धर्म का उदय किसी साम्राज्य की राजधानी से नहीं, कल्याण-भाव वाले छोटे-से ग्राम से होगा; बड़े परिवर्तन प्रायः हाशिये से उठते हैं। विष्णुयशा — "जिसका यश विष्णु हो": अवतार उस घर उतरेगा जहाँ कीर्ति की एकमात्र पूँजी भगवद्-निष्ठा है। श्वेत अश्व — गति और शुद्धि का संगम: परिवर्तन तीव्र भी होगा, निर्मल भी। और खड्ग — यहाँ सबसे अधिक सावधानी चाहिए: परंपरा की गहरी व्याख्या में यह खड्ग केवल युद्ध-शस्त्र नहीं, विवेक की धार है — ज्ञान-परंपरा में खड्ग सदा से अविद्या-ग्रंथि काटने का प्रतीक रहा है (गीता तक "ज्ञान-असि" की भाषा बोलती है); कल्कि का खड्ग अधर्म-विच्छेद का प्रतीक है — रक्तपात का उत्सव नहीं।
कार्य — म्लेच्छ नहीं, मल का नाश
पुराण-वाक्य कहते हैं कि कल्कि दुष्ट-दस्यु वृत्तियों का, छद्म-वेशधारी अधर्मी सत्ताओं का अंत करेंगे। यहाँ वह स्पष्टता अनिवार्य है जो इस कथा की रक्षा करती है — पुराणों का "अधर्मी" कोई जाति, समुदाय, देश या पंथ नहीं है: वह असत्य, अत्याचार, लोभ और छद्म की वृत्तियाँ हैं, जो हर युग में, हर समाज में — और सच पूछिए तो हर मन में — उगती हैं। कल्कि-कथा का उपयोग किसी मानव-समूह के विरुद्ध करना इस कथा की आत्मा की हत्या है; परंपरा ने यह कथा घृणा जगाने के लिए नहीं, आशा जगाने के लिए रची है।
परंपरा-धाराओं में यह सुंदर विवरण भी मिलता है कि चिरंजीवी परशुराम भावी कल्कि के शस्त्र-गुरु होंगे — शिव-आराधना और विद्या-ग्रहण की कथा कल्कि पुराण की धारा में है। (यह परवर्ती परंपरा-विवरण है — भागवत की मुख्य धारा का अंग नहीं; स्रोत-भेद सहित ही कहना उचित है।) एक अवतार दूसरे को दीक्षा दे — चिरंजीवी-परंपरा और अवतार-परंपरा का यह संगम भक्तों को प्रिय है: मानो परशुराम का रुका हुआ फरसा युगों से इसी शिष्य की प्रतीक्षा में हो।
पुनर्स्थापना — देवापि, मरु और नव-सत्ययुग
कल्कि-प्रसंग का समापन विनाश पर नहीं, पुनर्स्थापना पर होता है — यही इस कथा की असली दिशा है। परंपरा कहती है कि अधर्म-तंत्र के अंत के बाद सत्ययुग का चक्र पुनः चलेगा — मनुष्यों के चित्त निर्मल होंगे, धर्म चारों चरणों पर खड़ा होगा। भागवत-विष्णु पुराण की धाराओं में यह विलक्षण विवरण भी है कि देवापि (कुरु-वंश) और मरु (इक्ष्वाकु-वंश) नामक प्राचीन राजर्षि — जो परंपरा के अनुसार युगों से तप में प्रतीक्षारत हैं — नव-युग में धर्म-राज्य की व्यवस्था सँभालेंगे: पुरानी श्रेष्ठता नष्ट नहीं होती; वह प्रतीक्षा करती है, और नया युग उसे फिर बुला लेता है।
इस पृष्ठ की तीन अटल स्पष्टताएँ
इस पोर्टल की नीति के अनुरूप तीन बातें बिल्कुल साफ — पहली: कल्कि-अवतरण भविष्य की धार्मिक मान्यता है; इसकी कोई तिथि, वर्ष या "निकट भविष्य" की गणना शास्त्र-सम्मत रीति से संभव नहीं, और हम कोई गणना नहीं करते — पुराण स्वयं कलियुग को लक्ष-वर्षीय कहते हैं। दूसरी: इतिहास में समय-समय पर स्वयं को कल्कि घोषित करने वाले होते आए हैं — शास्त्रीय परंपरा किसी जीवित या ऐतिहासिक व्यक्ति के ऐसे दावे को मान्यता नहीं देती; ग्रंथ-वर्णित लक्षण किसी विज्ञापन से पूरे नहीं होते। तीसरी: इस कथा का कोई राजनीतिक या सामुदायिक उपयोग — किसी भी दिशा में — इसकी आत्मा के विरुद्ध है; कल्कि किसी दल, देश या समूह के "पक्ष" के नहीं, धर्म-वृत्ति के पक्षधर हैं, और धर्म-वृत्ति की पहली माँग स्वयं के मन का शोधन है।
तो प्रतीक्षा का अर्थ क्या हो? परंपरा का उत्तर कर्मठ है — हाथ पर हाथ धरे बैठना नहीं। गीता का वचन (धर्म-ग्लानि पर प्रकट होने का) यहाँ भविष्य के लिए दोहराया गया है, पर उसी गीता ने कर्तव्य को कभी स्थगित नहीं होने दिया। जो व्यक्ति आज असत्य के आगे झुकने से इनकार करता है, अपने हिस्से की करुणा और सच्चाई जीता है — वह उसी धर्म-पुनर्स्थापना का सैनिक है जिसका पूर्ण रूप परंपरा कल्कि में देखती है। श्वेत अश्व तभी दौड़ता आता है, जब धरती पर उसके स्वागत योग्य हृदय बचे हों।
🪶 कथा के अन्य संस्करण
✦ कल्कि पुराण बनाम भागवत-विष्णु पुराण का वर्णन-भेद
भागवत और विष्णु पुराण में कल्कि-प्रसंग संक्षिप्त, सूत्र-रूप है — शम्भल, विष्णुयशा, कार्य और सत्ययुग-आरंभ। कल्कि पुराण (परवर्ती, स्वतंत्र उपपुराण-परंपरा) में विस्तृत कथा-चक्र है — माता सुमति, पत्नी पद्मा, परशुराम-शिक्षा, विविध अभियान आदि। दोनों स्तर अलग-अलग पहचानने योग्य हैं — संक्षिप्त महापुराण-सूत्र और विस्तृत परवर्ती कथा-विकास; इन्हें एक स्तर का बताना उचित नहीं।
✦ अन्य परंपराओं के भावी-उद्धारक विचार
भविष्य के उद्धारक की अवधारणा कई परंपराओं में स्वतंत्र रूप से मिलती है — बौद्ध परंपरा के मैत्रेय आदि। ये समांतर विचार-धाराएँ हैं; इनके पारस्परिक संबंध विद्वानों के विमर्श का विषय हैं — हम केवल सह-अस्तित्व का सादर उल्लेख करते हैं, कोई समीकरण नहीं बनाते।
📚 कथा का स्रोत और प्रमाण
स्रोत-नाम सामान्य सन्दर्भ हेतु हैं; जहाँ अध्याय/श्लोक-संख्या निश्चित नहीं, वहाँ केवल ग्रंथ/स्कंध-स्तर का नाम दिया गया है — कोई श्लोक-संख्या गढ़ी नहीं गई।
🎨 स्वरूप एवं प्रतीक
चित्र-परंपरा में कल्कि श्वेत अश्व पर आरूढ़, खड्ग उठाए तेजस्वी युवा रूप में अंकित होते हैं — दशावतार-पट्टिकाओं की अंतिम मूर्ति; कहीं-कहीं अश्व-मुख रूप की विरल शिल्प-धारा भी मिलती है (यह हयग्रीव से भिन्न, कल्कि की ही एक क्षेत्रीय चित्रण-परंपरा है)।
प्रतीक-भाषा में श्वेत अश्व शुद्ध गति का है — कालचक्र को नई दिशा देती ऊर्जा; खड्ग विवेक-धार का — अधर्म-ग्रंथि का विच्छेदक, रक्त-उत्सव नहीं; उठा हुआ रूप "अभी कार्य शेष है" की मुद्रा; और दशावतार-क्रम में अंतिम स्थान इस घोषणा का कि कथा का अंतिम अध्याय सदा भविष्य में सुरक्षित है — आशा परंपरा की अंतिम मूर्ति है।
🪔 प्रमुख शिक्षाएँ (8)
- अंधकार कितना भी घना हो, अंतिम नहीं — काल-चक्र अधर्म पर नहीं रुकता
- नव-धर्म का उदय हाशिये से होता है — शम्भल कोई राजधानी नहीं, कल्याण-ग्राम है
- खड्ग का असली अर्थ विवेक है — काटनी अधर्म-ग्रंथि है, मनुष्य नहीं
- प्रतीक्षा कर्तव्य के साथ हो — आज की सच्चाई ही कल के सत्ययुग की ईंट है
- श्रेष्ठता नष्ट नहीं होती, प्रतीक्षा करती है — देवापि-मरु का धैर्य-सूत्र
- स्वयंभू "कल्कि" दावों से सावधान — शास्त्र किसी जीवित व्यक्ति के दावे को मान्यता नहीं देता
- भविष्य-कथा का उपयोग भय या घृणा के लिए करना उसकी आत्मा की हत्या है
- धर्म-वृत्ति की पहली माँग अपने मन का शोधन है — कलियुग बाहर से पहले भीतर हारता है
🕉️ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक अर्थ
कल्कि-मान्यता भारतीय काल-दर्शन (चक्रीय समय) की स्वाभाविक परिणति है — जहाँ समय रेखा नहीं, चक्र है, वहाँ कोई भी युग "अंतिम" नहीं हो सकता: कलि के गर्भ में ही सत्य का बीज है। दर्शन की भाषा में कल्कि "आशा का सिद्धांत" हैं — यह प्रतिज्ञा कि मूल्य-व्यवस्था का क्षय स्थायी नहीं; और साथ ही "उत्तरदायित्व का सिद्धांत" भी — क्योंकि चक्र घुमाने वाला हस्तक्षेप उन्हीं हृदयों की भूमि पर उतरता है जो तब तक धर्म-बीज सँभाले रहे (देवापि-मरु का प्रतीक)। मनोविज्ञान की दृष्टि से यह कथा सामूहिक निराशा का पुराण-सम्मत उपचार है — भविष्य को भय की नहीं, प्रतीक्षा-योग्य आशा की भाषा देना; और उसकी शर्त भी स्पष्ट रखना: प्रतीक्षा निष्क्रियता नहीं, तैयारी है।
🛕 संबंधित मंदिर एवं तीर्थ
- कल्कि की स्वतंत्र मंदिर-परंपरा विरल है — भावी अवतार की पूजा-परंपरा सीमित होना स्वाभाविक है; यह ईमानदारी से उल्लेखनीय है
- कल्कि मंदिर, जयपुर (राजस्थान) — विरल ऐतिहासिक कल्कि-मंदिरों में प्रसिद्ध (जयसिंह-कालीन परंपरा)
- दशावतार-पट्टिकाओं वाले मंदिर — जहाँ अंतिम मूर्ति रूप में कल्कि सर्वत्र अंकित हैं
- "शम्भल" की पहचान पर परंपरा-भेद हैं — किसी स्थल का पुष्ट दावा शास्त्र-सम्मत नहीं; हम कोई स्थल-दावा नहीं करते
🎉 उत्सव एवं पूजा-परंपरा
कल्कि जयंती की परंपरा श्रावण शुक्ल षष्ठी से जोड़ी जाती है — भावी अवतार की "जयंती" वस्तुतः स्मरण-श्रद्धा का दिन है, जन्म-तिथि का दावा नहीं; यह भेद समझना ही इस पर्व की शिक्षा है। दशावतार-स्तुति पाठों में कल्कि-वंदना नित्य-परंपरा है। तिथि-निर्णय स्थानीय पंचांग से; भविष्य की कोई गणना यहाँ नहीं की गई है।
⚖️ परंपरा-भेद / ध्यान दें
कल्कि भविष्य की मान्यता है — तिथि/वर्ष की कोई भविष्यवाणी शास्त्र-सम्मत नहीं; किसी जीवित या ऐतिहासिक व्यक्ति को कल्कि बताना परंपरा-विरुद्ध है; और इस कथा का राजनीतिक/सामुदायिक उपयोग इसकी आत्मा के विरुद्ध है।
⚠️ प्रचलित भ्रम और तथ्य (5)
✖ भ्रम: कल्कि के आगमन की तिथि/वर्ष की गणना की जा चुकी है।
✔ तथ्य: कोई तिथि-गणना शास्त्र-सम्मत नहीं — पुराण कलियुग की अवधि लक्षों वर्षों की कहते हैं, अर्थात परंपरा स्वयं इसे सुदूर भविष्य में रखती है; "निकट अंत" के दावे कथा का दुरुपयोग हैं।
✖ भ्रम: अमुक जीवित/ऐतिहासिक व्यक्ति कल्कि हैं (या थे)।
✔ तथ्य: शास्त्रीय परंपरा किसी व्यक्ति के ऐसे दावे को मान्यता नहीं देती — स्वयंभू घोषणाएँ होती आई हैं और होती रहेंगी; ग्रंथ-लक्षण विज्ञापन से पूरे नहीं होते।
✖ भ्रम: कल्कि-कथा किसी समुदाय/पंथ के विरुद्ध युद्ध की भविष्यवाणी है।
✔ तथ्य: पुराणों का "अधर्म" वृत्ति है — असत्य, अत्याचार, लोभ — कोई मानव-समूह नहीं; इस कथा का सामुदायिक-राजनीतिक उपयोग इसकी आत्मा के विरुद्ध है। कथा का स्वर आशा है, घृणा नहीं।
✖ भ्रम: भागवत और कल्कि पुराण का कल्कि-वर्णन एक ही स्तर का है।
✔ तथ्य: भागवत-विष्णु पुराण में सूत्र-रूप संक्षिप्त उल्लेख है; कल्कि पुराण परवर्ती, विस्तृत उपपुराण-धारा है (परशुराम-शिक्षा आदि वहीं से) — स्तर-भेद जानकर ही दोनों का उपयोग उचित है।
✖ भ्रम: कल्कि-मान्यता का संदेश है — "अंत निकट है, भयभीत रहो।"
✔ तथ्य: ठीक उल्टा — यह आशा-कथा है: अधर्म स्थायी नहीं, चक्र घूमेगा, सत्ययुग आएगा; और तब तक का धर्म है अपने हिस्से की सच्चाई जीना। भय बेचना इस कथा की आत्मा के विरुद्ध है।
❓ प्रश्नोत्तर (10)
कल्कि कौन हैं?
परंपरा के अनुसार भगवान विष्णु का भावी अवतार — कलियुग के अंतिम चरण में शम्भल ग्राम में विष्णुयशा के पुत्र रूप में प्रकट होने की मान्यता; चौबीस-सूची का एकमात्र भविष्यत्-अवतरण।
कल्कि कब आएँगे?
कोई तिथि-गणना शास्त्र-सम्मत नहीं — पुराण-परंपरा कलियुग को लक्ष-वर्षीय कहती है, अर्थात यह सुदूर भविष्य की मान्यता है; तिथि-दावे कथा का दुरुपयोग हैं।
शम्भल कहाँ है?
ग्रंथ-वर्णित ग्राम है; उसकी भौगोलिक पहचान पर परंपरा-भेद हैं — कोई पुष्ट स्थल-दावा शास्त्र-सम्मत नहीं; प्रतीक-व्याख्या "कल्याण-भूमि" की है।
देवदत्त क्या है?
परंपरा में कल्कि के श्वेत अश्व का नाम — गति और शुद्धि का प्रतीक।
कल्कि के खड्ग का क्या अर्थ है?
गहरी परंपरा-व्याख्या में विवेक की धार — अधर्म-ग्रंथि का विच्छेदक; ज्ञान-परंपरा में खड्ग सदा अविद्या काटने का प्रतीक रहा है। यह हिंसा-उत्सव का चिह्न नहीं।
क्या परशुराम कल्कि के गुरु होंगे?
यह कल्कि पुराण की परवर्ती धारा का सुंदर विवरण है — चिरंजीवी परशुराम से शस्त्र-शिक्षा; भागवत की मुख्य धारा का अंग नहीं, अतः स्रोत-भेद सहित ही कहना उचित है।
देवापि और मरु कौन हैं?
पुराण-परंपरा के प्रतीक्षारत राजर्षि (कुरु व इक्ष्वाकु वंश) — मान्यता है कि नव-सत्ययुग में वे धर्म-राज्य की व्यवस्था सँभालेंगे; श्रेष्ठता की प्रतीक्षा-शक्ति का प्रतीक।
क्या किसी व्यक्ति को कल्कि मानना उचित है?
नहीं — शास्त्रीय परंपरा किसी जीवित या ऐतिहासिक व्यक्ति के कल्कि-दावे को मान्यता नहीं देती; ऐसे दावों से सावधान रहना ही परंपरा-सम्मत विवेक है।
कल्कि जयंती क्या है?
श्रावण शुक्ल षष्ठी से जुड़ी स्मरण-परंपरा — यह श्रद्धा-दिवस है, भावी जन्म-तिथि की गणना नहीं; तिथि-निर्णय स्थानीय पंचांग से।
इस मान्यता से आज क्या लें?
आशा और उत्तरदायित्व — अधर्म स्थायी नहीं है, यह भरोसा; और तब तक अपने हिस्से की सच्चाई-करुणा जीना, यह कर्तव्य। प्रतीक्षा निष्क्रियता नहीं, तैयारी है।
🌺 निष्कर्ष
तेईस कथाएँ भूतकाल में कही जाती हैं; यह चौबीसवीं भविष्यत् काल में लिखी है — और इसी व्याकरण में इसका पूरा दर्शन है। परंपरा ने अपनी अवतार-माला का अंतिम मनका जान-बूझकर भविष्य में टाँका: ताकि कथा कभी "समाप्त" न हो; ताकि हर युग का पाठक जान ले कि धर्म का अंतिम अध्याय अभी लिखा जाना शेष है — और शायद उसकी अपनी पंक्तियाँ भी उसमें दर्ज होंगी।
कल्कि-मान्यता का हृदय भय नहीं, आशा है — यह बात जितनी बार दोहराई जाए, कम है; क्योंकि इस कथा के दुरुपयोग दोनों दिशाओं से होते हैं: कोई "अंत निकट है" का भय बेचता है, कोई स्वयं को कल्कि घोषित करता है, कोई इसे किसी समुदाय के विरुद्ध नारा बनाता है। तीनों इस कथा के शत्रु हैं। पुराणों का कल्कि किसी मनुष्य-समूह से नहीं लड़ता — वह उन वृत्तियों से लड़ता है जो हर मनुष्य में उग सकती हैं: असत्य, लोभ, अत्याचार, छद्म। और इसीलिए इस कथा की सच्ची तैयारी बाहर नहीं, भीतर होती है — कलियुग पहले मन में हारता या जीतता है।
देवापि और मरु का प्रतीक इस कथा का सबसे कोमल आश्वासन है — पुराणों ने दो प्राचीन राजर्षियों को युगों की प्रतीक्षा में तपरत रखा है, ताकि नए युग को व्यवस्था देने वाले हाथ तैयार मिलें। संदेश स्पष्ट है: जो श्रेष्ठ है, वह व्यर्थ नहीं जाता — प्रतीक्षा करता है। हर वह व्यक्ति जो आज ईमानदारी को "अव्यावहारिक" कहे जाने पर भी नहीं छोड़ता, इसी देवापि-परंपरा का तपस्वी है।
चौबीस अवतारों की यह माला इसीलिए कल्कि पर पूरी होती है — आरंभ में ज्ञान (सनकादि), मध्य में मर्यादा और प्रेम (राम-कृष्ण), और अंत में आशा। कथा का अंतिम वाक्य अभी लिखा नहीं गया; और परंपरा की दृष्टि में यही सबसे सुंदर बात है — धर्म की कथा कभी समाप्त नहीं होती। श्वेत अश्व की टापें कब गूँजेंगी, यह कोई नहीं जानता; पर उसके स्वागत की भूमि हर पीढ़ी को तैयार रखनी है — यही कल्कि-प्रतीक्षा का एकमात्र शास्त्र-सम्मत अर्थ है।
सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं; जहाँ परंपराएँ भिन्न हैं, वहाँ स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।