इतिहास — रामायण, महाभारत
दो महाकाव्य — धर्म का जीवंत पाठ
सनातन परंपरा रामायण और महाभारत को "इतिहास" कहती है — "ऐसा ही हुआ" — क्योंकि ये केवल काव्य नहीं, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों पुरुषार्थों का जीवन-चित्रण हैं। वाल्मीकि रामायण आदिकाव्य है — मर्यादा, वचन-पालन और आदर्श संबंधों की कथा। महाभारत स्वयं घोषणा करता है कि जो यहाँ है वही अन्यत्र है — एक लाख श्लोकों का यह विश्वकोशीय महाकाव्य धर्म की जटिलता को बिना सरलीकरण के सामने रखता है; श्रीमद्भगवद्गीता इसी का अमर अंश है। दोनों महाकाव्यों की सैकड़ों लोक-रचनाएँ (रामचरितमानस, कम्ब रामायण, पंडवानी आदि) भारतीय भाषाओं की साहित्य-परंपरा की जननी बनीं।
वाल्मीकि रामायण — सात कांड
बालकांड
जन्म, शिक्षा, सीता-विवाह।
अयोध्याकांड
वनवास-प्रसंग — वचन और त्याग की पराकाष्ठा।
अरण्यकांड
वन-जीवन, सीता-हरण।
किष्किन्धाकांड
सुग्रीव-मैत्री, वानर-सेना।
सुन्दरकांड
हनुमान की लंका-यात्रा — साहस और विश्वास का कांड।
युद्धकांड (लंकाकांड)
राम-रावण युद्ध, विजय, राज्याभिषेक।
उत्तरकांड
उत्तर-कथा; इसकी प्राचीनता पर विद्वद्-मतभेद है — पाठ-परंपरा में सम्मिलित।
महाभारत — अठारह पर्व
आदि, सभा, वन, विराट, उद्योग, भीष्म (गीता इसी में), द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक, स्त्री, शांति (विशालतम — राजधर्म-मोक्षधर्म), अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण। हरिवंश इसका खिल (परिशिष्ट) है। शांति और अनुशासन पर्व नीति-धर्म के विश्वकोश हैं; यक्ष-प्रश्न, विदुर-नीति, सनत्सुजातीय जैसे अंश स्वतंत्र अध्ययन-योग्य हैं।
लोक-परंपरा में इतिहास
तुलसीदास का रामचरितमानस (अवधी), कम्बन की तमिल रामायण, कृत्तिवास की बांग्ला रामायण, एझुत्तच्छन की मलयालम रचना — हर भाषा ने राम-कथा को अपनाया। महाभारत लोक-मंचों (यक्षगान, पंडवानी, तेरुक्कूत्तु) में आज भी जीवित है। यह बहु-पाठ परंपरा सनातन दृष्टि की उदारता दिखाती है — मूल एक, अभिव्यक्तियाँ अनेक।