मंत्र संग्रह
28 मंत्र — पूर्ण देवनागरी पाठ, स्रोत-संदर्भ, सरल अर्थ, उच्चारण नोट और परंपरागत प्रसंग के साथ। कहीं भी फल का वचन नहीं — केवल आध्यात्मिक भाव।
ॐ (प्रणव)
ॐ
ॐ को उपनिषदों में सम्पूर्ण जगत का प्रतीक-अक्षर कहा गया है। अ-उ-म — तीन मात्राओं में जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं का संकेत माना जाता है।
गायत्री मंत्र
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥
सवितृ (दिव्य तेज, सूर्य रूप) के वरणीय तेज का हम ध्यान करते हैं; वह तेज हमारी बुद्धियों को प्रेरित करे। यह बुद्धि के प्रकाश की प्रार्थना है।
महामृत्युंजय मंत्र
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
हम त्र्यम्बक (तीन नेत्रों वाले रुद्र) का यजन करते हैं, जो सुगंधित और पुष्टि बढ़ाने वाले हैं। जैसे पका खरबूजा बेल के बंधन से सहज छूट जाता है, वैसे ही हम मृत्यु के बंधन से छूटें — अमृतत्व (मोक्ष) से नहीं। यह मृत्यु-भय से ऊपर उठने और मुक्ति के प्रतीकवाद का मंत्र है।
शिव पंचाक्षर मंत्र
ॐ नमः शिवाय
शिव को नमन। "नमः शिवाय" के पाँच अक्षर (न-मः-शि-वा-य) पंचाक्षर कहलाते हैं; शैव परंपरा में इन्हें पंच तत्वों से भी जोड़ा जाता है।
गणेश मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः
गणपति को नमन। "गं" गणेश जी का बीजाक्षर माना जाता है। परंपरा में कार्य के आरंभ में गणेश-स्मरण शुभ माना जाता है।
वक्रतुण्ड श्लोक
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
हे वक्रतुण्ड, विशाल काय, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी देव! मेरे कार्यों में विघ्न न आएँ — यह प्रार्थना का भाव है।
सरस्वती मंत्र
ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः
विद्या की देवी सरस्वती को नमन। "ऐं" सरस्वती जी का बीजाक्षर माना जाता है।
द्वादशाक्षर मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भगवान वासुदेव (कृष्ण/विष्णु) को नमन। बारह अक्षरों के कारण द्वादशाक्षर मंत्र कहलाता है।
अष्टाक्षर मंत्र
ॐ नमो नारायणाय
नारायण को नमन। आठ अक्षरों का यह मंत्र वैष्णव परंपरा में "अष्टाक्षर" नाम से प्रसिद्ध है।
राम मंत्र
श्री राम जय राम जय जय राम
श्री राम के नाम का कीर्तन। परंपरा में राम-नाम को सरलतम स्मरण माना गया है।
हरे कृष्ण महामंत्र
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरि (कृष्ण) और राम के नामों का कीर्तन। गौड़ीय वैष्णव परंपरा में चैतन्य महाप्रभु से जुड़ी नाम-संकीर्तन की धारा का केंद्रीय मंत्र।
कृष्ण मंत्र
ॐ क्लीं कृष्णाय नमः
श्री कृष्ण को नमन। "क्लीं" को परंपरा में आकर्षण-बीज कहा जाता है।
हनुमान मंत्र
ॐ हं हनुमते नमः
हनुमान जी को नमन। परंपरा में हनुमान जी को शक्ति, भक्ति और विनम्रता का आदर्श माना जाता है।
हनुमान चालीसा
40 चौपाइयों में हनुमान जी के गुणों, राम-भक्ति और प्रसंगों का वर्णन। यह मंत्र नहीं, भक्ति-स्तोत्र है।
दुर्गा स्तुति (नारायणि)
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
हे सब मंगलों की मंगलरूपा, कल्याणमयी, शरण देने वाली, त्रिनेत्रा गौरी नारायणी! आपको नमन। यह देवी के प्रति शरणागति का स्तुति-श्लोक है।
लक्ष्मी मंत्र
ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
महालक्ष्मी को नमन। "श्रीं" को परंपरा में श्री (शोभा, समृद्धि के तत्व) का बीजाक्षर कहा जाता है।
सूर्य मंत्र
ॐ सूर्याय नमः
सूर्य देव को नमन। परंपरा में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता कहा गया है।
आदित्य हृदय स्तोत्र (संदर्भ)
सूर्य (आदित्य) की स्तुति का स्तोत्र। परंपरा अनुसार रावण-युद्ध से पूर्व अगस्त्य मुनि ने श्री राम को इसका उपदेश दिया। यह पूर्ण स्तोत्र है; यहाँ केवल परिचय दिया गया है।
मंगल कामना मंत्र
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी शुभ देखें, कोई दुःख का भागी न हो। यह विश्व-कल्याण की भावना है।
सह नाववतु (शांतिपाठ)
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
गुरु-शिष्य की साझी प्रार्थना: हम दोनों की एक साथ रक्षा हो, हम साथ पोषित हों, साथ पुरुषार्थ करें, हमारा अध्ययन तेजस्वी हो, हम परस्पर द्वेष न करें।
असतो मा सद्गमय
ॐ असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
मुझे असत् से सत् की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमृतत्व की ओर ले चलो। यह आत्म-उन्नति की प्रार्थना है।
पूर्णमदः (शांतिपाठ)
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
वह (ब्रह्म) पूर्ण है, यह (जगत) पूर्ण है; पूर्ण से पूर्ण प्रकट होता है; पूर्ण में से पूर्ण लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है। यह पूर्णता के दर्शन का सूत्र है।
गुरु वंदना
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥
गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर रूप हैं; गुरु साक्षात् परब्रह्म हैं — ऐसे श्री गुरु को नमन। यह गुरु के प्रति परम आदर का श्लोक है।
अन्नपूर्णा स्तुति
अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे। ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥
हे सदा पूर्ण अन्नपूर्णा, शिव-प्राणवल्लभा पार्वती! ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए भिक्षा दीजिए। अन्न के प्रति कृतज्ञता और ज्ञान की याचना का भाव।
स्वस्ति मंत्र
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
महान कीर्ति वाले इन्द्र, सर्वज्ञ पूषा, अरिष्टनेमि तार्क्ष्य (गरुड़) और बृहस्पति हमारे लिए कल्याण (स्वस्ति) धारण करें। यह मंगल-कामना का वैदिक मंत्र है।
त्वमेव माता
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥
हे देवों के देव! तुम ही माता हो, तुम ही पिता, बंधु, सखा, विद्या और धन — मेरा सब कुछ तुम्हीं हो। यह पूर्ण समर्पण का भाव है।
कराग्रे वसते (प्रातः स्मरण)
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥
हथेली के अग्रभाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती और मूल में गोविन्द का वास माना गया है; इसलिए प्रातः अपनी हथेलियों का दर्शन करने की परंपरा है — अर्थात् दिन का आरंभ अपने ही कर्म (हाथों) के प्रति सजगता से।
शुभं करोति (दीप मंत्र)
शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यं धनसम्पदा। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥
दीप की ज्योति को नमन, जिसे परंपरा में शुभता, कल्याण और (भीतर के) वैर-भाव के शमन का प्रतीक माना गया है। यह प्रतीकात्मक अर्थ है, कोई वचन नहीं।