सनातन ज्ञान
ज्ञान संसार
शास्त्र पुस्तकालय · श्रुति

वेद

ऋग्, यजुर्, साम, अथर्व — सनातन ज्ञान का मूल स्रोत

वेद सनातन परंपरा के प्राचीनतम ग्रंथ हैं और "श्रुति" कहलाते हैं — अर्थात वह ज्ञान जो ऋषियों ने गहन साधना में "सुना" (अनुभव किया) और जो गुरु-शिष्य परंपरा से मौखिक रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रहा। वेद चार हैं — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। प्रत्येक वेद केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक पूरा साहित्य-परिवार है जिसमें संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद — चार परतें होती हैं। वैदिक मंत्रों का उच्चारण-शुद्ध संरक्षण (पाठ-विधियाँ जैसे पद, क्रम, जटा, घन) विश्व की मौखिक परंपराओं में विशिष्ट माना जाता है।

चार वेद

ऋग्वेद

ऋचाओं (स्तुति-मंत्रों) का संग्रह — 10 मंडल, लगभग 10,552 मंत्र। अग्नि, इंद्र, वरुण, उषा आदि देवताओं की स्तुतियाँ तथा नासदीय सूक्त, पुरुष सूक्त जैसे दार्शनिक सूक्त।

यजुर्वेद

यज्ञ-विधियों के गद्य-पद्य मंत्र। दो प्रमुख शाखा-परिवार — शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयि संहिता) और कृष्ण यजुर्वेद (तैत्तिरीय संहिता आदि)।

सामवेद

गान का वेद — अधिकांश मंत्र ऋग्वेद से लेकर संगीतबद्ध किए गए। भारतीय संगीत-परंपरा की जड़ें सामगान से जुड़ी मानी जाती हैं।

अथर्ववेद

दैनिक जीवन, आरोग्य, गृहस्थ-जीवन, राजधर्म और औषधि-ज्ञान से जुड़े मंत्र। पृथ्वी सूक्त जैसे पर्यावरण-चेतना के सूक्त भी इसी में हैं।

प्रत्येक वेद की चार परतें

वैदिक साहित्य की संरचना समझने की कुंजी यह है कि प्रत्येक वेद चार परतों में विकसित हुआ। यह क्रम स्थूल कर्म से सूक्ष्म ज्ञान की ओर यात्रा दिखाता है।

संहिता

मूल मंत्र-संग्रह — स्तुतियाँ, यज्ञ-मंत्र, गान।

ब्राह्मण

गद्य ग्रंथ — यज्ञों की विधि, अर्थ और कथाएँ (जैसे शतपथ ब्राह्मण, ऐतरेय ब्राह्मण)।

आरण्यक

"वन के ग्रंथ" — यज्ञ के प्रतीकात्मक/आध्यात्मिक अर्थ पर चिंतन; ब्राह्मण और उपनिषद के बीच की कड़ी।

उपनिषद

ज्ञानकांड — आत्मा, ब्रह्म, जगत के स्वरूप पर संवाद। वेदों का अंतिम भाग होने से "वेदान्त" कहलाते हैं।

शाखा-परंपरा और संरक्षण

प्रत्येक वेद की अनेक "शाखाएँ" (पाठ-परंपराएँ) रहीं — जैसे ऋग्वेद की शाकल शाखा, यजुर्वेद की माध्यंदिन और तैत्तिरीय शाखाएँ। समय के साथ अनेक शाखाएँ लुप्त हुईं, पर जो उपलब्ध हैं वे आज भी वैदिक पाठशालाओं में पढ़ाई जाती हैं। मंत्रों की स्वर-शुद्धता बनाए रखने के लिए घन, जटा, क्रम जैसी पाठ-विधियाँ विकसित हुईं — इसी कारण सहस्राब्दियों बाद भी पाठ-भेद न्यूनतम रहा।

मूल ग्रंथपरिचय उपलब्ध