भगवान बलराम
जिनका आयुध शस्त्र नहीं — किसान का हल था — 24 अवतार, क्रम 19
भगवान बलराम
✦ हलधर — शेष-अवतार ✦
📍 जिनका आयुध शस्त्र नहीं — किसान का हल था
✨ एक झलक
श्रीमद्भागवत सूचीश्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता बलराम — हल और मूसल जिनके आयुध हैं — को परंपरा शेषनाग का अवतरण और भागवत-सूची में स्वतंत्र अवतार मानती है। देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरण की विलक्षण "संकर्षण" कथा से जन्मे बलराम गोकुल की लीलाओं से लेकर द्वारका तक कृष्ण के अभिन्न सहचर रहे — पर अपने स्पष्ट, सरल, न्यायप्रिय व्यक्तित्व के साथ। भीम-दुर्योधन दोनों के गदा-गुरु; कुरुक्षेत्र में दोनों पक्षों में प्रियजन देख तटस्थ तीर्थयात्रा का मार्ग चुना। कृषि, बल और निश्छल स्नेह के देव — जगन्नाथ पुरी में बलभद्र रूप में आज भी बड़े भाई के आदर से पूजित।
🪷 एक दृष्टि में
🔤 नाम का अर्थ
"बलराम" = बल + राम — बल में रमण करने वाले, बल के आनंद-स्वरूप; परंपरा में "बल" यहाँ आध्यात्मिक-शारीरिक दोनों शक्तियों का वाचक है। "संकर्षण" नाम गर्भ-स्थानांतरण से — "सम्यक् कर्षण" (खींचा जाना); वैष्णव दर्शन (पांचरात्र-परंपरा) में संकर्षण चतुर्व्यूह का एक व्यूह भी है — यह नाम दर्शन और कथा दोनों में गूँजता है। "हलधर/हलायुध" — हल ही जिनका आयुध; और "बलभद्र" — कल्याणकारी बल: नाम-परंपरा ही घोषणा है कि यह शक्ति भद्र (मंगलकारी) है।
🌄 कथा की पृष्ठभूमि
कंस के कारागार में देवकी-वसुदेव की छह संतानें मारी जा चुकी थीं। परंपरा कहती है कि सातवें गर्भ में स्वयं शेष-तत्त्व उतरा — और भगवान के निर्देश से योगमाया ने उस गर्भ को देवकी से आकर्षित कर गोकुल में रोहिणी (वसुदेव की दूसरी पत्नी, जो नंद-भवन में सुरक्षित थीं) के गर्भ में स्थापित किया। लोक में प्रचार हुआ कि देवकी का सातवाँ गर्भ नष्ट हुआ; वस्तुतः वह "संकर्षित" हुआ था — इसी से नाम पड़ा संकर्षण। इस प्रकार बलराम जन्म से ही दो माताओं के पुत्र हैं — देवकी के गर्भ-पुत्र, रोहिणी के जन्म-पुत्र; और कृष्ण से पहले धरती पर आकर मानो अग्रज-धर्म की भूमिका सँभाल चुके थे।
परंपरा इन्हें शेषनाग का अवतरण मानती है — वही शेष, जिन पर क्षीरसागर में नारायण शयन करते हैं; रामावतार में यही तत्त्व लक्ष्मण रूप में छोटा भाई था, इस बार बड़ा भाई हुआ — परंपरा की यह समरूपता भक्तों को अत्यंत प्रिय है: जो नित्य भगवान का आधार है, वह हर अवतार में उनके सबसे निकट जन्मता है।
📖 संपूर्ण अवतार-कथा
गोकुल — दो भाइयों का बचपन
गोकुल-वृंदावन की लीलाएँ कृष्ण-कथा के नाम से प्रसिद्ध हैं, पर उनमें हर जगह एक गौर-वर्ण छाया साथ है — दाऊ। माखन-लीलाओं में सहभागी, गो-चारण में अग्रज, और संकट में ढाल। बल के प्रसंग बलराम के हिस्से ही आए — ताल-वन का धेनुकासुर (गर्दभ-रूप असुर) बलराम के हाथों समाप्त हुआ, और प्रलम्बासुर का प्रसंग तो उनकी पहचान-कथा है: खेल-खेल में असुर बलराम को कंधे पर उठाकर भागा, और बालक के मुष्टि-प्रहार ने उसका अंत कर दिया — कृष्ण की माया जहाँ मुस्कान से काम लेती है, बलराम का बल वहाँ सीधा उत्तर देता है। यही दोनों भाइयों का स्थायी स्वभाव-भेद है — कृष्ण वक्र (कलात्मक), बलराम ऋजु (सीधे); और दोनों मिलकर पूर्ण।
यमुना-आकर्षण की कथा बलराम के हल की सबसे प्रसिद्ध लीला है — विश्राम-क्रीड़ा के प्रसंग में यमुना को निकट बुलाने पर न आने से हलधर ने हल की नोक से धारा को ही खींचकर मार्ग बदल दिया (भागवत-हरिवंश की धाराओं में यह प्रसंग व्रज व द्वारका-काल दोनों से जुड़ा मिलता है)। प्रतीक की भाषा में यह किसान का चिर-कर्म है — जल को खेत की ओर मोड़ना; हलधर वही करते हैं जो कृषक युगों से करता आया है, बस दिव्य परिमाण में।
मथुरा — अखाड़े से गुरुकुल तक
अक्रूर के साथ दोनों भाई मथुरा पहुँचे — कंस के अखाड़े में चाणूर-मुष्टिक जैसे मल्लों के विरुद्ध किशोर भाइयों का द्वंद्व हुआ: कृष्ण ने चाणूर का, बलराम ने मुष्टिक का अंत किया; फिर कंस-वध (कृष्ण द्वारा) के साथ मथुरा मुक्त हुई। इसके बाद दोनों संदीपनि-आश्रम (उज्जयिनी) में विद्यार्थी बने — चौंसठ कलाओं का अध्ययन; अवतार भी गुरुकुल की मर्यादा से ही विद्या पाते हैं। आगे जरासंध के आक्रमणों के दीर्घ अध्याय में बलराम कृष्ण के युद्ध-सहचर रहे — और समुद्र-मध्य द्वारका के निर्माण-प्रसंग में नगर-व्यवस्था के सहभागी।
द्वारका-काल में बलराम का विवाह रैवत-कन्या रेवती से हुआ — रेवती-प्रसंग की पुराण-कथा (पूर्व-युग की कन्या, जिसकी लंबी देह बलराम ने हल से सामान्य की) युग-परिवर्तन की रोचक प्रतीक-कथा है। उनके व्यक्तित्व के मानवीय रंग भी परंपरा ने सहेजे — वारुणी-प्रसंग जैसी सहज-सरल छवियाँ, स्पष्ट क्रोध, तत्काल क्षमा; बलराम में देवत्व और लोक-स्वभाव का विरल घुलाव है।
गदा-गुरु — और महाभारत की तटस्थता
गदा-विद्या के परम आचार्य रूप में बलराम ने दो विलक्षण शिष्य बनाए — भीम और दुर्योधन; विद्या-दान में पक्ष नहीं देखा। पर यही दोनों शिष्य जब कुरुक्षेत्र में आमने-सामने हुए, तो गुरु के सामने असंभव चुनाव था। कृष्ण पांडव-पक्ष में सारथी बने; बलराम ने युद्ध से विरत रहकर तीर्थयात्रा का मार्ग चुना — सरस्वती-तट के तीर्थों की दीर्घ यात्रा, जिसका वर्णन भागवत-महाभारत की परंपरा में विस्तार से है। यह पलायन नहीं था — यह उस हृदय का निर्णय था जो दोनों पक्षों में अपने देखता था और किसी के विरुद्ध शस्त्र नहीं उठा सकता था। परंपरा इसमें संत-दृष्टि पढ़ती है: हर धर्म-संकट में तलवार ही उत्तर नहीं; कभी विरक्त तटस्थता भी एक धर्म है। युद्ध के अंतिम दिन लौटे बलराम भीम-दुर्योधन गदा-युद्ध के साक्षी बने — भीम के मर्म-प्रहार पर क्रुद्ध भी हुए (शिष्य-मोह और न्याय-प्रियता का द्वंद्व), पर कृष्ण के समझाने पर विधि-विधान स्वीकार किया।
तीर्थयात्रा-क्रम का एक कठोर प्रसंग भी ईमानदारी से — नैमिषारण्य में रोमहर्षण सूत (व्यास-शिष्य, पौराणिक) आसन से नहीं उठे, तो बलराम के आवेश में कुश-प्रहार से उनका देहांत हुआ; ऋषियों के क्षोभ पर बलराम ने प्रायश्चित्त किया और उनके पुत्र (उग्रश्रवा) को पिता का पद दिलाया। परंपरा इस प्रसंग को आवेश के परिणाम और प्रायश्चित्त-धर्म की शिक्षा के रूप में पढ़ती है — अवतार-चरित्र भी मर्यादा-भंग का मूल्य चुकाता दिखे, यही पुराणों की ईमानदारी है।
अंतिम अध्याय — शेष का विश्राम
यादव-वंश के अंत (मौसल-प्रसंग) के साक्षी बलराम भी बने — प्रभास-क्षेत्र में वंश-विनाश के बाद परंपरा कहती है कि बलराम सागर-तट पर योगस्थ हुए और उनके मुख से श्वेत शेष-तत्त्व निकलकर सागर की ओर चला गया — शेष अपने नित्य-धाम लौट गए। जो आधार बनकर आया था, वह कार्य पूर्ण कर मौन विदा हुआ — न युद्ध में, न शोक में; योग में।
बलभद्र — जगन्नाथ के बड़े भाई
बलराम की सबसे जीवंत उपस्थिति आज जगन्नाथ पुरी में है — रत्न-सिंहासन पर जगन्नाथ (कृष्ण) और सुभद्रा के साथ बलभद्र विराजते हैं, और रथ यात्रा में उनका तालध्वज रथ सबसे आगे चलता है: बड़ा भाई आगे — परंपरा ने यह मर्यादा वहाँ भी रखी है। ब्रज के बलदेव ग्राम का दाऊजी मंदिर ब्रज-परंपरा का प्रमुख बलराम-धाम है; किसान-परंपराएँ हलधर को कृषि-देव रूप में स्मरण करती हैं — हल षष्ठी (बलराम जयंती) व्रत-परंपरा इसी की स्मृति है।
🪶 कथा के अन्य संस्करण
✦ हरिवंश व महाभारत की बलराम-धाराएँ
हरिवंश (महाभारत का खिल-पर्व) बलराम-चरित के अनेक प्रसंगों का विस्तृत स्रोत है — यमुना-प्रसंग, द्विविद-वध, हस्तिनापुर-आकर्षण (सांब-विवाह प्रसंग में नगर को हल से खींचने की प्रसिद्ध कथा) आदि; भागवत और महाभारत की धाराओं में विवरण-भेद हैं। पांचरात्र-दर्शन की चतुर्व्यूह-परंपरा में "संकर्षण" व्यूह का दार्शनिक स्थान स्वतंत्र विषय है — कथा और दर्शन की धाराएँ अलग-अलग पहचानने योग्य हैं।
✦ जैन परंपरा के बलदेव
जैन पुराण-परंपरा (त्रिषष्टिशलाकापुरुष) में बलराम "बलदेव" पद के शलाका-पुरुषों में गिने जाते हैं — वहाँ कथा-ढाँचा स्वतंत्र है। यह समांतर परंपरा का सादर उल्लेख-मात्र है; दोनों धाराएँ अपनी-अपनी हैं।
📚 कथा का स्रोत और प्रमाण
स्रोत-नाम सामान्य सन्दर्भ हेतु हैं; जहाँ अध्याय/श्लोक-संख्या निश्चित नहीं, वहाँ केवल ग्रंथ/स्कंध-स्तर का नाम दिया गया है — कोई श्लोक-संख्या गढ़ी नहीं गई।
🎨 स्वरूप एवं प्रतीक
चित्र-परंपरा में बलराम गौर (श्वेत-कांति) वर्ण, नील वस्त्रधारी, बलिष्ठ स्वरूप हैं — एक स्कंध पर हल, कर में मूसल, कानों में कुंडल, प्रायः मद-विनोद की सहज मुद्रा; कहीं-कहीं शीश पर शेष-फण की छाया। जगन्नाथ-परंपरा की बलभद्र-मूर्ति श्वेत वर्ण और विशिष्ट लोक-शैली की है।
प्रतीक-भाषा में हल सृजन-शक्ति का है — वही भुजा जो युद्ध कर सकती है, अन्न उगाती है; मूसल श्रम-संस्कृति का; गौर वर्ण शेष-तत्त्व (आधार, धवल स्थिरता) का; और नील वस्त्र धरती-जल से जुड़े कृषक-जीवन का। कृष्ण-बलराम की युगल-छवि (श्याम-गौर) परंपरा में पुरुष-प्रकृति, माधुर्य-ऐश्वर्य, नीति-बल के युग्म की तरह ध्यायी जाती है।
🪔 प्रमुख शिक्षाएँ (8)
- बल की सार्थकता रक्षा और सृजन में है, प्रदर्शन में नहीं — हल भी उसी भुजा का गौरव है जो गदा उठाती है
- हर संकट में तलवार उत्तर नहीं — कभी विरक्त तटस्थता भी धर्म है (कुरुक्षेत्र-तीर्थयात्रा)
- विद्या-दान में पक्षपात नहीं — भीम और दुर्योधन दोनों को समान गदा-शिक्षा
- सरल-स्पष्ट स्वभाव भी दिव्यता है — वक्रता ही चतुराई नहीं
- आवेश का मूल्य चुकाना और प्रायश्चित्त करना बड़प्पन है (रोमहर्षण-प्रसंग)
- अग्रज-धर्म: आगे चलना, ढाल बनना, श्रेय अनुज को देना — दाऊ का जीवन-सूत्र
- श्रम की गरिमा — कृषि-कर्म को आयुध की प्रतिष्ठा देने वाला एकमात्र देव-रूप
- कार्य पूर्ण होने पर मौन विदा — शेष का सागर-गमन: आसक्ति-हीन समापन
🕉️ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक अर्थ
बलराम-तत्त्व का दार्शनिक अर्थ "आधार" है — शेष वही है जो "शेष रहता है": सृष्टि के प्रलय में भी जो आधार-चेतना बची रहती है, परंपरा उसी को शेष कहती है, और वही तत्त्व हर अवतार में भगवान के निकटतम (लक्ष्मण/बलराम) होकर उतरता है। पांचरात्र-दर्शन में संकर्षण-व्यूह जीव-तत्त्व और संहार-शक्ति के अधिष्ठान रूप में चिंतित है — कथा का हलधर और दर्शन का संकर्षण मिलकर यह कहते हैं: शक्ति का शुद्धतम रूप वह है जो धारण करे (शेष), पोषण करे (हल) और अहंकार न पाले (तटस्थता)। कृष्ण-बलराम युग्म भारतीय चिंतन का प्रिय संतुलन-सूत्र है — नीति और बल, माधुर्य और मर्यादा, कला और श्रम: कोई अकेला पूर्ण नहीं; दोनों भाई साथ हों, तभी गोकुल सुरक्षित है।
🛕 संबंधित मंदिर एवं तीर्थ
- जगन्नाथ मंदिर, पुरी (ओडिशा) — बलभद्र रूप में नित्य पूजा; रथ यात्रा में तालध्वज रथ सबसे आगे
- दाऊजी मंदिर, बलदेव (मथुरा, उ.प्र.) — ब्रज की प्रमुख बलराम-पीठ; हुरंगा उत्सव प्रसिद्ध
- केदारेश्वर-प्रभास क्षेत्र (सोमनाथ, गुजरात) — बलराम-निर्वाण (शेष-गमन) की परंपरागत स्थली
- अनंत-शेष परंपरा के स्थल — शेषनाग-तत्त्व से जुड़ी नाग-पूजा परंपराएँ (नाग पंचमी-लोक में हलधर-स्मरण सहित)
🎉 उत्सव एवं पूजा-परंपरा
हल षष्ठी / बलराम जयंती (भाद्रपद कृष्ण षष्ठी की परंपरा) — संतान-मंगल व्रत के रूप में लोक में प्रचलित; ब्रज के दाऊजी में विशेष उत्सव। रथ यात्रा (आषाढ़) में बलभद्रजी का तालध्वज रथ अग्रगामी रहता है — बड़े भाई की मर्यादा का जीवित दृश्य। कृषि-परंपराओं में हल-पूजन के अवसरों पर हलधर-स्मरण की लोक-परिपाटी है। तिथियाँ स्थानीय पंचांग से।
⚖️ परंपरा-भेद / ध्यान दें
दशावतार की कुछ सूचियों में बलराम गिने जाते हैं (प्रायः बुद्ध के स्थान पर) और कुछ में नहीं — भागवत की चतुर्विंशति-सूची में वे स्वतंत्र अवतार हैं; यह सूची-वैविध्य परंपरा में सहज स्वीकृत है।
⚠️ प्रचलित भ्रम और तथ्य (5)
✖ भ्रम: बलराम केवल कृष्ण के सहायक हैं — स्वतंत्र अवतार नहीं।
✔ तथ्य: भागवत की चतुर्विंशति-सूची में बलराम स्वतंत्र अवतार-प्रविष्टि हैं — शेष-तत्त्व का अवतरण; उनका व्यक्तित्व, लीला-क्षेत्र और उपासना-परंपरा (बलभद्र, दाऊजी) स्वतंत्र रूप से जीवित है।
✖ भ्रम: दशावतार में बलराम का होना/न होना एक "गलती" है।
✔ तथ्य: दशावतार-सूचियाँ परंपरा-भेद रखती हैं — कुछ में बुद्ध हैं, कुछ में उनके स्थान पर बलराम; दोनों धाराएँ प्राचीन और मान्य हैं। सूची-वैविध्य दोष नहीं, परंपरा की विविधता है।
✖ भ्रम: कुरुक्षेत्र में तटस्थ रहना बलराम की दुर्बलता थी।
✔ तथ्य: दोनों पक्षों में शिष्य-स्वजन देखकर शस्त्र न उठाना उनका सचेत धर्म-निर्णय था — परंपरा इसे संत-दृष्टि कहती है; वे युद्ध से नहीं, पक्षधर हिंसा से विरत हुए और तीर्थ-सेवा में लगे।
✖ भ्रम: यमुना-आकर्षण और हस्तिनापुर-आकर्षण एक ही कथा है।
✔ तथ्य: दो भिन्न प्रसंग हैं — यमुना-प्रसंग जल-धारा के हल-आकर्षण का (भागवत-हरिवंश धाराएँ), हस्तिनापुर-प्रसंग सांब-विवाह विवाद में नगर को हल से खींचने की हरिवंश-कथा; धाराओं में विवरण-भेद भी हैं।
✖ भ्रम: रोहिणी-गर्भ की कथा बलराम को "कम" दिव्य बनाती है।
✔ तथ्य: उल्टा — संकर्षण-प्रसंग योगमाया की अद्भुत लीला और शेष-तत्त्व की रक्षा-कथा है; दो माताओं (देवकी-रोहिणी) का पुत्र होना परंपरा में उनकी विशिष्ट महिमा है।
❓ प्रश्नोत्तर (11)
बलराम कौन हैं?
श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता — परंपरा के अनुसार शेषनाग का अवतरण और भागवत की चतुर्विंशति-सूची में स्वतंत्र अवतार; हल-मूसल जिनके आयुध हैं।
"संकर्षण" नाम क्यों पड़ा?
देवकी के सप्तम गर्भ को योगमाया द्वारा रोहिणी के गर्भ में "सम्यक् कर्षित" (स्थानांतरित) करने की कथा से — यह नाम पांचरात्र-दर्शन के चतुर्व्यूह में भी है।
बलराम और शेषनाग का क्या संबंध है?
परंपरा इन्हें शेष-तत्त्व का अवतरण मानती है — रामावतार में लक्ष्मण, कृष्णावतार में बलराम; जो नित्य भगवान का आधार है, वही निकटतम भाई बनकर उतरता है।
हल और मूसल ही आयुध क्यों?
यह बल और श्रम-संस्कृति के योग की घोषणा है — जो भुजा युद्ध कर सकती है, वही अन्न उगाए; बलराम कृषि-कर्म को आयुध की प्रतिष्ठा देने वाले देव हैं।
बलराम के गुरु-शिष्य कौन थे?
कृष्ण संग संदीपनि-आश्रम में विद्या पाई; गदा-विद्या में भीम और दुर्योधन — दोनों — इनके शिष्य हुए।
महाभारत-युद्ध में बलराम किस पक्ष में थे?
किसी में नहीं — दोनों पक्षों में प्रियजन देख उन्होंने तटस्थ रहकर सरस्वती-तीर्थों की यात्रा की; अंतिम गदा-युद्ध के साक्षी बनकर लौटे।
रेवती कौन थीं?
रैवत-कन्या, बलराम की पत्नी — पूर्व-युग से जुड़ी उनकी विवाह-कथा युग-परिवर्तन की रोचक पुराण-प्रतीक कथा है।
बलराम का देह-त्याग कैसे हुआ?
यादव-वंश के अंत के बाद प्रभास-तट पर योगस्थ होकर — परंपरा के अनुसार श्वेत शेष-तत्त्व उनके मुख से निकलकर सागर की ओर लौट गया।
जगन्नाथ पुरी में बलराम की क्या स्थिति है?
बलभद्र रूप में जगन्नाथ-सुभद्रा सहित रत्न-सिंहासन पर नित्य पूजित — रथ यात्रा में उनका तालध्वज रथ सबसे आगे चलता है।
हल षष्ठी क्या है?
भाद्रपद कृष्ण षष्ठी की बलराम-जयंती परंपरा — लोक में संतान-मंगल व्रत रूप में प्रचलित; तिथि-निर्णय स्थानीय पंचांग से।
इस अवतार से आज क्या सीखें?
बल को सृजन से जोड़ना, विद्या-दान में निष्पक्षता, आवश्यक हो तो सम्मानपूर्वक तटस्थता — और श्रम को आयुध जितनी प्रतिष्ठा देना।
🌺 निष्कर्ष
बलराम-कथा उस भाई की कथा है जो सदा मंच के किनारे खड़ा रहा — और फिर भी मंच उसी की पीठ पर टिका था। कृष्ण-कथा की चकाचौंध में दाऊ का गौर-वर्ण प्रायः ओझल रह जाता है; पर ध्यान से देखिए — गोकुल की हर लीला में वह ढाल है, मथुरा के अखाड़े में आधा उत्तर वही है, द्वारका की व्यवस्था में उसका श्रम है, और पुरी के रथ-पथ पर आज भी वह सबसे आगे चलता है। परंपरा ने उसे "शेष" कहा — जो बचा रहता है, जो थामे रहता है; और सच पूछिए तो हर परिवार, हर संगठन का एक बलराम होता है — कम बोलने वाला, अधिक उठाने वाला।
उनके चरित्र की दो शिक्षाएँ हमारे समय के लिए विशेष हैं। पहली — हल की प्रतिष्ठा: देवताओं के आयुध-कोश में चक्र है, त्रिशूल है, वज्र है; बलराम अकेले हैं जिनका आयुध किसान का उपकरण है। यह संयोग नहीं, वक्तव्य है — जिस सभ्यता ने अन्न उगाने वाली भुजा को गदा उठाने वाली भुजा से ऊँचा माना, उसने बलराम गढ़े। श्रम की गरिमा जब भी गिरने लगे, हलधर का स्मरण उसे उठा देता है।
दूसरी — कुरुक्षेत्र की तटस्थता: दोनों पक्षों में अपने हों, तो क्या करें? बलराम का उत्तर आज के हर उस व्यक्ति के लिए है जो विभाजित निष्ठाओं में फँसा है — हर संघर्ष में कूदना अनिवार्य नहीं; कभी-कभी शस्त्र न उठाना ही सबसे कठिन शौर्य है, बशर्ते वह भय से नहीं, प्रेम से जन्मा हो। बलराम भागे नहीं — वे तीर्थ गए; निष्क्रिय नहीं हुए — सेवा में लगे।
और रोमहर्षण-प्रसंग की वह ईमानदार झलक — आवेश, भूल, प्रायश्चित्त — बताती है कि परंपरा ने बलराम को "निर्दोष मूर्ति" नहीं, जीवित चरित्र बनाया: बलवान का क्रोध कितना महँगा है, और प्रायश्चित्त कितना बड़ा। गदा रखकर हल उठाने वाली भुजाएँ धन्य हैं — बलराम-कथा का यही अंतिम वाक्य है; और जब तक धरती पर हल चलता है, हलधर की कथा चलती रहेगी।
सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं; जहाँ परंपराएँ भिन्न हैं, वहाँ स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।