श्री सुंदरी (श्रीपर्वत)
52 शक्तिपीठ में क्रम 36 — लद्दाख की परंपरा / श्रीशैलम की परंपरा — मतभेद
श्री सुंदरी (श्रीपर्वत)
✦ श्री सुंदरी ✦
📍 लद्दाख की परंपरा / श्रीशैलम की परंपरा — मतभेद
🛕 पीठ-परिचय
मतभेद उपलब्ध⚖️ स्थान/पहचान — परंपरा-भेद
श्रीपर्वत की पहचान पर स्पष्ट मतभेद — एक परंपरा लद्दाख के पर्वतीय क्षेत्र से जोड़ती है, दूसरी दक्षिण के श्रीशैलम से (जिसका प्राचीन नाम श्रीपर्वत रहा)। कोई एक स्थान निश्चित नहीं।
📖 इस पीठ की कथा
परंपरागत / पौराणिक कथासूची-परंपरा कहती है कि श्रीपर्वत पीठ पर सती के दाएँ पैर का तल्प गिरा — देवी श्री सुंदरी और भैरव सुंदरानंद रूप में पूजित हुए। "श्रीपर्वत" की पहचान दो दूर-दूर की दिशाओं में होती रही है: एक परंपरा हिमालय पार लद्दाख के प्राचीन देवी-स्थान की, दूसरी दक्षिण के श्रीशैलम की — संस्कृत साहित्य और शैव-सिद्ध परंपरा में "श्रीपर्वत" नाम से वही नल्लमला पहाड़ी प्रसिद्ध रही है, जहाँ मल्लिकार्जुन-भ्रमरांबा विराजते हैं। निर्णायक प्रमाण किसी पक्ष में नहीं — दोनों मान्यताएँ यथावत प्रस्तुत हैं।
🪔 मूल शक्तिपीठ-कथा (सती–दक्ष-यज्ञ प्रसंग) पढ़ें
परंपरागत (पौराणिक) कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव का वरण किया। दक्ष ने एक महायज्ञ रचा, जिसमें सभी देवता आमंत्रित हुए — पर शिव और सती को नहीं बुलाया गया। सती बिना निमंत्रण पितृगृह गईं, जहाँ दक्ष ने भरी सभा में शिव का घोर अपमान किया। पति-निंदा सुनकर सती ने उसी यज्ञ-वेदी के समक्ष योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी।
सती के देह-त्याग का समाचार पाकर शिव का शोक प्रलय बन गया। वीरभद्र ने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया, और शिव सती का पार्थिव शरीर कंधे पर उठाए तीनों लोकों में तांडव करने लगे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया।
मान्यता है कि सती के अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान "शक्तिपीठ" बन गए — प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप (शक्ति) में और शिव एक विशिष्ट भैरव रूप में रक्षक होकर विराजे। इस प्रकार शक्तिपीठ-परंपरा पूरे भारतवर्ष — और उसके पार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका तक — को एक देवी-देह के रूप में देखती है।
✨ महत्व
नाम-साम्य से बनी दोहरी पहचान (लद्दाख / श्रीशैलम); शोधाधीन।
सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं। सूचियाँ ग्रंथ-परंपराओं (51/52/108) में भिन्न मिलती हैं; विवादित पहचान स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।