कपालिनी (विभाष)
52 शक्तिपीठ में क्रम 37 — तामलुक, पूर्व मेदिनीपुर, पश्चिम बंगाल
कपालिनी (विभाष)
✦ कपालिनी (भीमरूपा) ✦
📍 तामलुक, पूर्व मेदिनीपुर, पश्चिम बंगाल
🛕 पीठ-परिचय
क्षेत्रीय परंपरा📖 इस पीठ की कथा
परंपरागत / पौराणिक कथामान्यता है कि विभाष क्षेत्र — आज के तामलुक — में सती के बाएँ पैर का गुल्फ गिरा, जहाँ देवी कपालिनी (भीमरूपा) रूप में पूजित हुईं। तामलुक प्राचीन ताम्रलिप्ति है — वह ऐतिहासिक बंदरगाह-नगरी जहाँ से समुद्री मार्ग सुदूर देशों तक जाते थे; अर्थात यह पीठ भारत के प्राचीन व्यापार-द्वार की देवी-स्थली है। रूपनारायण नदी के अंचल का बर्गभीमा मंदिर इस पीठ की जीवित परंपरा है, जहाँ देवी की उपासना काली-रूप में होती है। रथयात्रा और काली पूजा यहाँ के प्रमुख उत्सव हैं।
🪔 मूल शक्तिपीठ-कथा (सती–दक्ष-यज्ञ प्रसंग) पढ़ें
परंपरागत (पौराणिक) कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव का वरण किया। दक्ष ने एक महायज्ञ रचा, जिसमें सभी देवता आमंत्रित हुए — पर शिव और सती को नहीं बुलाया गया। सती बिना निमंत्रण पितृगृह गईं, जहाँ दक्ष ने भरी सभा में शिव का घोर अपमान किया। पति-निंदा सुनकर सती ने उसी यज्ञ-वेदी के समक्ष योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी।
सती के देह-त्याग का समाचार पाकर शिव का शोक प्रलय बन गया। वीरभद्र ने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया, और शिव सती का पार्थिव शरीर कंधे पर उठाए तीनों लोकों में तांडव करने लगे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया।
मान्यता है कि सती के अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान "शक्तिपीठ" बन गए — प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप (शक्ति) में और शिव एक विशिष्ट भैरव रूप में रक्षक होकर विराजे। इस प्रकार शक्तिपीठ-परंपरा पूरे भारतवर्ष — और उसके पार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका तक — को एक देवी-देह के रूप में देखती है।
✨ महत्व
प्राचीन ताम्रलिप्ति बंदरगाह-नगरी का पीठ; बर्गभीमा मंदिर परंपरा।
सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं। सूचियाँ ग्रंथ-परंपराओं (51/52/108) में भिन्न मिलती हैं; विवादित पहचान स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।