चंद्रभागा (प्रभास)
52 शक्तिपीठ में क्रम 38 — प्रभास क्षेत्र (सोमनाथ-वेरावल), गुजरात
चंद्रभागा (प्रभास)
✦ चंद्रभागा ✦
📍 प्रभास क्षेत्र (सोमनाथ-वेरावल), गुजरात
🛕 पीठ-परिचय
व्यापक प्रचलित मान्यता📖 इस पीठ की कथा
परंपरागत / पौराणिक कथापरंपरा के अनुसार प्रभास क्षेत्र में सती का उदर गिरा, जहाँ देवी चंद्रभागा रूप में पूजित हुईं। यह वही प्रभास-तीर्थ है जहाँ सोमनाथ ज्योतिर्लिंग विराजते हैं — बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम — और जहाँ चंद्रमा (सोम) के शाप-मोचन की प्रसिद्ध कथा जुड़ी है; "चंद्रभागा" नाम इसी चंद्र-परंपरा से संगति रखता है। हिरण्य, कपिला और सरस्वती के त्रिवेणी-संगम तथा अरब सागर के तट की यह भूमि शैव, शाक्त और कृष्ण-परंपरा (निकटवर्ती भालका तीर्थ) — तीनों की साक्षी है।
🪔 मूल शक्तिपीठ-कथा (सती–दक्ष-यज्ञ प्रसंग) पढ़ें
परंपरागत (पौराणिक) कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव का वरण किया। दक्ष ने एक महायज्ञ रचा, जिसमें सभी देवता आमंत्रित हुए — पर शिव और सती को नहीं बुलाया गया। सती बिना निमंत्रण पितृगृह गईं, जहाँ दक्ष ने भरी सभा में शिव का घोर अपमान किया। पति-निंदा सुनकर सती ने उसी यज्ञ-वेदी के समक्ष योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी।
सती के देह-त्याग का समाचार पाकर शिव का शोक प्रलय बन गया। वीरभद्र ने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया, और शिव सती का पार्थिव शरीर कंधे पर उठाए तीनों लोकों में तांडव करने लगे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया।
मान्यता है कि सती के अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान "शक्तिपीठ" बन गए — प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप (शक्ति) में और शिव एक विशिष्ट भैरव रूप में रक्षक होकर विराजे। इस प्रकार शक्तिपीठ-परंपरा पूरे भारतवर्ष — और उसके पार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका तक — को एक देवी-देह के रूप में देखती है।
✨ महत्व
सोमनाथ के प्रभास-तीर्थ का शक्तिपीठ; चंद्र-कथा और त्रिवेणी-संगम की भूमि।
सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं। सूचियाँ ग्रंथ-परंपराओं (51/52/108) में भिन्न मिलती हैं; विवादित पहचान स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।