अपर्णा (करतोयातट)
52 शक्तिपीठ में क्रम 35 — भवानीपुर, शेरपुर (बगुड़ा अंचल)
अपर्णा (करतोयातट)
✦ अपर्णा ✦
📍 भवानीपुर, शेरपुर (बगुड़ा अंचल)
🛕 पीठ-परिचय
क्षेत्रीय परंपरा📖 इस पीठ की कथा
परंपरागत / पौराणिक कथामान्यता है कि करतोया नदी के तट पर सती के बाएँ पैर का तल्प — नूपुर-आभूषण सहित भाग — गिरा, जहाँ देवी अपर्णा रूप में पूजित हुईं। "अपर्णा" नाम की कथा सुंदर है — तप करती पार्वती ने पत्ते (पर्ण) तक का आहार त्याग दिया, तब वे "अ-पर्णा" कहलाईं। बगुड़ा अंचल का भवानीपुर गाँव इस पीठ की जीवित स्थली है; पास ही प्राचीन पुंड्रवर्धन नगरी (महास्थानगढ़) के अवशेष हैं — अर्थात यह पीठ बंगाल की प्राचीनतम नगर-सभ्यता की छाया में बसा है।
🪔 मूल शक्तिपीठ-कथा (सती–दक्ष-यज्ञ प्रसंग) पढ़ें
परंपरागत (पौराणिक) कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव का वरण किया। दक्ष ने एक महायज्ञ रचा, जिसमें सभी देवता आमंत्रित हुए — पर शिव और सती को नहीं बुलाया गया। सती बिना निमंत्रण पितृगृह गईं, जहाँ दक्ष ने भरी सभा में शिव का घोर अपमान किया। पति-निंदा सुनकर सती ने उसी यज्ञ-वेदी के समक्ष योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी।
सती के देह-त्याग का समाचार पाकर शिव का शोक प्रलय बन गया। वीरभद्र ने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया, और शिव सती का पार्थिव शरीर कंधे पर उठाए तीनों लोकों में तांडव करने लगे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया।
मान्यता है कि सती के अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान "शक्तिपीठ" बन गए — प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप (शक्ति) में और शिव एक विशिष्ट भैरव रूप में रक्षक होकर विराजे। इस प्रकार शक्तिपीठ-परंपरा पूरे भारतवर्ष — और उसके पार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका तक — को एक देवी-देह के रूप में देखती है।
✨ महत्व
करतोया-तट की प्राचीन तीर्थ-परंपरा; अपर्णा-तप की नाम-कथा।
सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं। सूचियाँ ग्रंथ-परंपराओं (51/52/108) में भिन्न मिलती हैं; विवादित पहचान स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।