यशोरेश्वरी (यशोर)
52 शक्तिपीठ में क्रम 48 — ईश्वरीपुर, श्यामनगर, सातखीरा
यशोरेश्वरी (यशोर)
✦ यशोरेश्वरी ✦
📍 ईश्वरीपुर, श्यामनगर, सातखीरा
🛕 पीठ-परिचय
क्षेत्रीय परंपरा📖 इस पीठ की कथा
परंपरागत / पौराणिक कथामान्यता है कि यशोर क्षेत्र में सती के करतल (हथेलियाँ) गिरे, जहाँ देवी यशोरेश्वरी — यशोर की ईश्वरी — रूप में पूजित हुईं। सातखीरा जिले के ईश्वरीपुर में स्थित यह मंदिर मध्यकाल में राजा प्रतापादित्य — बारह भुइयाँ में प्रसिद्ध — के संरक्षण से जुड़ा रहा; अनुश्रुति है कि उन्होंने देवी को अपनी आराध्या मानकर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। सुंदरवन-अंचल के निकट की यह पीठ-स्थली कठिन दौरों में भी स्थानीय हिंदू समाज की श्रद्धा से जीवित रही है; काली पूजा यहाँ का प्रमुख पर्व है।
🪔 मूल शक्तिपीठ-कथा (सती–दक्ष-यज्ञ प्रसंग) पढ़ें
परंपरागत (पौराणिक) कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव का वरण किया। दक्ष ने एक महायज्ञ रचा, जिसमें सभी देवता आमंत्रित हुए — पर शिव और सती को नहीं बुलाया गया। सती बिना निमंत्रण पितृगृह गईं, जहाँ दक्ष ने भरी सभा में शिव का घोर अपमान किया। पति-निंदा सुनकर सती ने उसी यज्ञ-वेदी के समक्ष योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी।
सती के देह-त्याग का समाचार पाकर शिव का शोक प्रलय बन गया। वीरभद्र ने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया, और शिव सती का पार्थिव शरीर कंधे पर उठाए तीनों लोकों में तांडव करने लगे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया।
मान्यता है कि सती के अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान "शक्तिपीठ" बन गए — प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप (शक्ति) में और शिव एक विशिष्ट भैरव रूप में रक्षक होकर विराजे। इस प्रकार शक्तिपीठ-परंपरा पूरे भारतवर्ष — और उसके पार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका तक — को एक देवी-देह के रूप में देखती है।
✨ महत्व
यशोर (बांग्लादेश) की पीठ-परंपरा; राजा प्रतापादित्य के संरक्षण की ऐतिहासिक स्मृति।
सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं। सूचियाँ ग्रंथ-परंपराओं (51/52/108) में भिन्न मिलती हैं; विवादित पहचान स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।