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52 शक्तिपीठ

विरजा (उत्कल)

52 शक्तिपीठ में क्रम 10 — जाजपुर, वैतरणी तट, ओडिशा

विरजा (उत्कल)

विमला (विरजा)

📍 जाजपुर, वैतरणी तट, ओडिशा

🛕 पीठ-परिचय

व्यापक प्रचलित मान्यता
देवी (शक्ति) रूपविमला (विरजा)
भैरवजगन्नाथ
गिरा अंग/आभूषणनाभि
आधुनिक स्थानजाजपुर, वैतरणी तट, ओडिशा
देशभारत

⚖️ स्थान/पहचान — परंपरा-भेद

उत्कल-पीठ की पहचान पर दो परंपराएँ हैं — जाजपुर की विरजा देवी और पुरी (जगन्नाथ मंदिर परिसर) की विमला देवी; दोनों मान्यताएँ ओडिशा में जीवित हैं।

📖 इस पीठ की कथा

परंपरागत / पौराणिक कथा

मान्यता है कि उत्कल में सती की नाभि गिरी — इसीलिए वैतरणी-तट का जाजपुर "नाभिगया" तीर्थ भी कहलाता है, जहाँ पिंडदान की गया-तुल्य परंपरा है। विरजा देवी की द्विभुजा महिषमर्दिनी प्रतिमा ओडिशा की प्राचीनतम देवी-मूर्तियों में है, और यहाँ की दुर्गापूजा सोलह दिन चलती है। विशेष बात — उत्कल परंपरा में भैरव-स्थान स्वयं जगन्नाथ को प्राप्त है; पुरी की विमला देवी को भी इसी पीठ से जोड़ा जाता है, जिन्हें अर्पित होकर ही जगन्नाथ का भोग महाप्रसाद बनता है।

🪔 मूल शक्तिपीठ-कथा (सती–दक्ष-यज्ञ प्रसंग) पढ़ें

परंपरागत (पौराणिक) कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव का वरण किया। दक्ष ने एक महायज्ञ रचा, जिसमें सभी देवता आमंत्रित हुए — पर शिव और सती को नहीं बुलाया गया। सती बिना निमंत्रण पितृगृह गईं, जहाँ दक्ष ने भरी सभा में शिव का घोर अपमान किया। पति-निंदा सुनकर सती ने उसी यज्ञ-वेदी के समक्ष योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी।

सती के देह-त्याग का समाचार पाकर शिव का शोक प्रलय बन गया। वीरभद्र ने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया, और शिव सती का पार्थिव शरीर कंधे पर उठाए तीनों लोकों में तांडव करने लगे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया।

मान्यता है कि सती के अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान "शक्तिपीठ" बन गए — प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप (शक्ति) में और शिव एक विशिष्ट भैरव रूप में रक्षक होकर विराजे। इस प्रकार शक्तिपीठ-परंपरा पूरे भारतवर्ष — और उसके पार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका तक — को एक देवी-देह के रूप में देखती है।

✨ महत्व

ओडिशा का प्रमुख पीठ; नाभिगया तीर्थ; शाक्त-वैष्णव संगम — जगन्नाथ ही भैरव।

सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं। सूचियाँ ग्रंथ-परंपराओं (51/52/108) में भिन्न मिलती हैं; विवादित पहचान स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।

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