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52 शक्तिपीठ

महालक्ष्मी (श्रीशैल)

52 शक्तिपीठ में क्रम 27 — श्रीशैल क्षेत्र, सिलहट

महालक्ष्मी (श्रीशैल)

महालक्ष्मी

📍 श्रीशैल क्षेत्र, सिलहट

🛕 पीठ-परिचय

मतभेद उपलब्ध
देवी (शक्ति) रूपमहालक्ष्मी
भैरवशंबरानंद
गिरा अंग/आभूषणग्रीवा (गला)
आधुनिक स्थानश्रीशैल क्षेत्र, सिलहट
देशबांग्लादेश

⚖️ स्थान/पहचान — परंपरा-भेद

"श्रीशैल" नाम से दो परंपराएँ हैं — बंगाल-सूचियाँ सिलहट (बांग्लादेश) के श्रीशैल क्षेत्र को पीठ मानती हैं; दक्षिण की परंपरा श्रीशैलम (आंध्र) की भ्रमरांबा देवी को, जो अष्टादश महाशक्तिपीठ सूची में भी हैं। दोनों प्रचलित हैं।

📖 इस पीठ की कथा

परंपरागत / पौराणिक कथा

मान्यता है कि श्रीशैल पीठ पर सती की ग्रीवा (गला) गिरी और देवी महालक्ष्मी रूप में पूजित हुईं। बंगाल की सूची-परंपरा इसे सिलहट अंचल से जोड़ती है — पूर्वी बंगाल की प्राचीन शाक्त-भूमि, जहाँ की देवी-परंपराएँ असम-बंगाल की तंत्र-धारा से जुड़ी रहीं। दक्षिण की सुदृढ़ परंपरा श्रीशैलम (आंध्र) को शक्ति-तीर्थ मानती है, जहाँ मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग और भ्रमरांबा देवी एक ही परिसर में विराजते हैं — ज्योतिर्लिंग और शक्ति-मान्यता का विरल संगम। दोनों परंपराएँ यथावत प्रस्तुत हैं।

🪔 मूल शक्तिपीठ-कथा (सती–दक्ष-यज्ञ प्रसंग) पढ़ें

परंपरागत (पौराणिक) कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव का वरण किया। दक्ष ने एक महायज्ञ रचा, जिसमें सभी देवता आमंत्रित हुए — पर शिव और सती को नहीं बुलाया गया। सती बिना निमंत्रण पितृगृह गईं, जहाँ दक्ष ने भरी सभा में शिव का घोर अपमान किया। पति-निंदा सुनकर सती ने उसी यज्ञ-वेदी के समक्ष योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी।

सती के देह-त्याग का समाचार पाकर शिव का शोक प्रलय बन गया। वीरभद्र ने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया, और शिव सती का पार्थिव शरीर कंधे पर उठाए तीनों लोकों में तांडव करने लगे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया।

मान्यता है कि सती के अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान "शक्तिपीठ" बन गए — प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप (शक्ति) में और शिव एक विशिष्ट भैरव रूप में रक्षक होकर विराजे। इस प्रकार शक्तिपीठ-परंपरा पूरे भारतवर्ष — और उसके पार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका तक — को एक देवी-देह के रूप में देखती है।

✨ महत्व

नाम-साम्य की दो जीवित परंपराएँ — सिलहट और श्रीशैलम (मल्लिकार्जुन-भ्रमरांबा)।

सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं। सूचियाँ ग्रंथ-परंपराओं (51/52/108) में भिन्न मिलती हैं; विवादित पहचान स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।

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