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52 शक्तिपीठ

गायत्री (मणिवेदिका)

52 शक्तिपीठ में क्रम 26 — पुष्कर, अजमेर, राजस्थान

गायत्री (मणिवेदिका)

गायत्री

📍 पुष्कर, अजमेर, राजस्थान

🛕 पीठ-परिचय

व्यापक प्रचलित मान्यता
देवी (शक्ति) रूपगायत्री
भैरवसर्वानंद
गिरा अंग/आभूषणमणिबंध (कलाइयाँ)
आधुनिक स्थानपुष्कर, अजमेर, राजस्थान
देशभारत

📖 इस पीठ की कथा

परंपरागत / पौराणिक कथा

परंपरा के अनुसार तीर्थराज पुष्कर में सती के मणिबंध — कलाइयाँ — गिरे; इसी से पीठ "मणिवेदिका" कहलाया। ब्रह्मा के विरल मंदिर की इस नगरी में वेदमाता गायत्री की पीठ-परंपरा है — कथा है कि ब्रह्मा के यज्ञ में सावित्री के समय पर न पहुँचने पर गायत्री यज्ञ-संगिनी बनीं; सावित्री और गायत्री की पहाड़ियाँ आज भी सरोवर के दो ओर आमने-सामने हैं। बावन घाटों वाले पुष्कर सरोवर का कार्तिक पूर्णिमा स्नान-मेला राजस्थान का सबसे जीवंत तीर्थ-पर्व है।

🪔 मूल शक्तिपीठ-कथा (सती–दक्ष-यज्ञ प्रसंग) पढ़ें

परंपरागत (पौराणिक) कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव का वरण किया। दक्ष ने एक महायज्ञ रचा, जिसमें सभी देवता आमंत्रित हुए — पर शिव और सती को नहीं बुलाया गया। सती बिना निमंत्रण पितृगृह गईं, जहाँ दक्ष ने भरी सभा में शिव का घोर अपमान किया। पति-निंदा सुनकर सती ने उसी यज्ञ-वेदी के समक्ष योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी।

सती के देह-त्याग का समाचार पाकर शिव का शोक प्रलय बन गया। वीरभद्र ने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया, और शिव सती का पार्थिव शरीर कंधे पर उठाए तीनों लोकों में तांडव करने लगे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया।

मान्यता है कि सती के अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान "शक्तिपीठ" बन गए — प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप (शक्ति) में और शिव एक विशिष्ट भैरव रूप में रक्षक होकर विराजे। इस प्रकार शक्तिपीठ-परंपरा पूरे भारतवर्ष — और उसके पार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका तक — को एक देवी-देह के रूप में देखती है।

✨ महत्व

तीर्थराज पुष्कर की देवी-परंपरा; वेदमाता गायत्री की पीठ-मान्यता।

सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं। सूचियाँ ग्रंथ-परंपराओं (51/52/108) में भिन्न मिलती हैं; विवादित पहचान स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।

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