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52 शक्तिपीठ

देवगर्भा (कांची)

52 शक्तिपीठ में क्रम 28 — कांकालीतला, बोलपुर क्षेत्र, बीरभूम, पश्चिम बंगाल

देवगर्भा (कांची)

देवगर्भा

📍 कांकालीतला, बोलपुर क्षेत्र, बीरभूम, पश्चिम बंगाल

🛕 पीठ-परिचय

क्षेत्रीय परंपरा
देवी (शक्ति) रूपदेवगर्भा
भैरवरुरु
गिरा अंग/आभूषणअस्थि (कंकाल-भाग)
आधुनिक स्थानकांकालीतला, बोलपुर क्षेत्र, बीरभूम, पश्चिम बंगाल
देशभारत

📖 इस पीठ की कथा

परंपरागत / पौराणिक कथा

मान्यता है कि कोपाई नदी के तट पर सती की अस्थि गिरी — इसी से स्थान का नाम कांकालीतला पड़ा। यहाँ की विलक्षण परंपरा यह है कि मंदिर-पार्श्व का कुंड ही पीठ का मूल स्थान माना जाता है — श्रद्धा है कि सती की अस्थि कुंड-जल में समाहित है, और कुंड-जल से ही देवी का अभिषेक होता है। शांतिनिकेतन से कुछ ही दूर स्थित यह पीठ बाउल-संस्कृति और शाक्त-परंपरा के अनोखे परिवेश में बसा है; तारापीठ भी इसी अंचल में है।

🪔 मूल शक्तिपीठ-कथा (सती–दक्ष-यज्ञ प्रसंग) पढ़ें

परंपरागत (पौराणिक) कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव का वरण किया। दक्ष ने एक महायज्ञ रचा, जिसमें सभी देवता आमंत्रित हुए — पर शिव और सती को नहीं बुलाया गया। सती बिना निमंत्रण पितृगृह गईं, जहाँ दक्ष ने भरी सभा में शिव का घोर अपमान किया। पति-निंदा सुनकर सती ने उसी यज्ञ-वेदी के समक्ष योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी।

सती के देह-त्याग का समाचार पाकर शिव का शोक प्रलय बन गया। वीरभद्र ने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया, और शिव सती का पार्थिव शरीर कंधे पर उठाए तीनों लोकों में तांडव करने लगे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया।

मान्यता है कि सती के अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान "शक्तिपीठ" बन गए — प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप (शक्ति) में और शिव एक विशिष्ट भैरव रूप में रक्षक होकर विराजे। इस प्रकार शक्तिपीठ-परंपरा पूरे भारतवर्ष — और उसके पार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका तक — को एक देवी-देह के रूप में देखती है।

✨ महत्व

बीरभूम की पीठ-श्रृंखला का प्रमुख स्थान; कुंड-केंद्रित पूजा-परंपरा।

सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं। सूचियाँ ग्रंथ-परंपराओं (51/52/108) में भिन्न मिलती हैं; विवादित पहचान स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।

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