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52 शक्तिपीठ

विश्वेश्वरी (सर्वशैल)

52 शक्तिपीठ में क्रम 41 — कोटिलिंगेश्वर घाट क्षेत्र, राजमहेंद्रवरम (राजमुंदरी), आंध्र प्रदेश

विश्वेश्वरी (सर्वशैल)

विश्वेश्वरी (राकिनी)

📍 कोटिलिंगेश्वर घाट क्षेत्र, राजमहेंद्रवरम (राजमुंदरी), आंध्र प्रदेश

🛕 पीठ-परिचय

क्षेत्रीय परंपरा
देवी (शक्ति) रूपविश्वेश्वरी (राकिनी)
भैरववत्सनाभ (दंडपाणि)
गिरा अंग/आभूषणकपोल (गाल)
आधुनिक स्थानकोटिलिंगेश्वर घाट क्षेत्र, राजमहेंद्रवरम (राजमुंदरी), आंध्र प्रदेश
देशभारत

📖 इस पीठ की कथा

परंपरागत / पौराणिक कथा

मान्यता है कि गोदावरी-तट के सर्वशैल क्षेत्र में सती का कपोल गिरा, जहाँ देवी विश्वेश्वरी — राकिनी — रूप में पूजित हुईं। राजमहेंद्रवरम (राजमुंदरी) के कोटिलिंगेश्वर घाट अंचल से यह परंपरा जुड़ी है — गोदावरी यहाँ सागर-संगम से पहले अपने विशालतम रूप में बहती है। बारह वर्षों में आने वाला गोदावरी पुष्करम स्नान-पर्व यहाँ का महातीर्थ-आयोजन है, जब लाखों श्रद्धालु घाटों पर उमड़ते हैं। तेलुगु भक्ति-संस्कृति में गोदावरी माता और देवी-उपासना की यह संगम-स्थली विशेष आदर रखती है।

🪔 मूल शक्तिपीठ-कथा (सती–दक्ष-यज्ञ प्रसंग) पढ़ें

परंपरागत (पौराणिक) कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव का वरण किया। दक्ष ने एक महायज्ञ रचा, जिसमें सभी देवता आमंत्रित हुए — पर शिव और सती को नहीं बुलाया गया। सती बिना निमंत्रण पितृगृह गईं, जहाँ दक्ष ने भरी सभा में शिव का घोर अपमान किया। पति-निंदा सुनकर सती ने उसी यज्ञ-वेदी के समक्ष योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी।

सती के देह-त्याग का समाचार पाकर शिव का शोक प्रलय बन गया। वीरभद्र ने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया, और शिव सती का पार्थिव शरीर कंधे पर उठाए तीनों लोकों में तांडव करने लगे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया।

मान्यता है कि सती के अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान "शक्तिपीठ" बन गए — प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप (शक्ति) में और शिव एक विशिष्ट भैरव रूप में रक्षक होकर विराजे। इस प्रकार शक्तिपीठ-परंपरा पूरे भारतवर्ष — और उसके पार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका तक — को एक देवी-देह के रूप में देखती है।

✨ महत्व

गोदावरी-तट (आंध्र) का पीठ; पुष्करम स्नान-पर्व की भूमि।

सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं। सूचियाँ ग्रंथ-परंपराओं (51/52/108) में भिन्न मिलती हैं; विवादित पहचान स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।

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