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52 शक्तिपीठ

जयंती

52 शक्तिपीठ में क्रम 19 — जयंतिया अंचल (मेघालय–सिलहट सीमा क्षेत्र)

जयंती

जयंती

📍 जयंतिया अंचल (मेघालय–सिलहट सीमा क्षेत्र)

🛕 पीठ-परिचय

क्षेत्रीय परंपरा
देवी (शक्ति) रूपजयंती
भैरवक्रमदीश्वर
गिरा अंग/आभूषणवाम जंघा
आधुनिक स्थानजयंतिया अंचल (मेघालय–सिलहट सीमा क्षेत्र)
देशभारत / बांग्लादेश (सीमा-अंचल)

⚖️ स्थान/पहचान — परंपरा-भेद

दो मान्यताएँ हैं — मेघालय के नरतियांग (जयंतिया पहाड़ी) की दुर्गा-स्थली और बांग्लादेश के सिलहट-जयंतियापुर अंचल का कालाजोर क्षेत्र। दोनों परंपराएँ जीवित हैं।

📖 इस पीठ की कथा

परंपरागत / पौराणिक कथा

परंपरा के अनुसार जयंतिया अंचल में सती की वाम जंघा गिरी, जहाँ देवी जयंती रूप में पूजित हुईं — "जयंती" नाम और "जयंतिया" पहाड़ियों का साम्य इस पीठ की क्षेत्रीय जड़ें दिखाता है। मेघालय की परंपरा नरतियांग की दुर्गा-स्थली को पीठ मानती है, जो जयंतिया राजवंश की आराध्या रही — यहाँ खासी-जयंतिया जनजातीय संस्कृति और शाक्त परंपरा का अद्भुत मेल है। सिलहट अंचल की परंपरा कालाजोर के देवी-स्थान को मानती है। दोनों मान्यताएँ पूर्वोत्तर में शक्ति-उपासना की लोक-शास्त्र संगम परंपरा की साक्षी हैं।

🪔 मूल शक्तिपीठ-कथा (सती–दक्ष-यज्ञ प्रसंग) पढ़ें

परंपरागत (पौराणिक) कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव का वरण किया। दक्ष ने एक महायज्ञ रचा, जिसमें सभी देवता आमंत्रित हुए — पर शिव और सती को नहीं बुलाया गया। सती बिना निमंत्रण पितृगृह गईं, जहाँ दक्ष ने भरी सभा में शिव का घोर अपमान किया। पति-निंदा सुनकर सती ने उसी यज्ञ-वेदी के समक्ष योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी।

सती के देह-त्याग का समाचार पाकर शिव का शोक प्रलय बन गया। वीरभद्र ने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया, और शिव सती का पार्थिव शरीर कंधे पर उठाए तीनों लोकों में तांडव करने लगे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया।

मान्यता है कि सती के अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान "शक्तिपीठ" बन गए — प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप (शक्ति) में और शिव एक विशिष्ट भैरव रूप में रक्षक होकर विराजे। इस प्रकार शक्तिपीठ-परंपरा पूरे भारतवर्ष — और उसके पार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका तक — को एक देवी-देह के रूप में देखती है।

✨ महत्व

पूर्वोत्तर सीमा-अंचल का पीठ; जनजातीय संस्कृति और शाक्त परंपरा का संगम।

सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं। सूचियाँ ग्रंथ-परंपराओं (51/52/108) में भिन्न मिलती हैं; विवादित पहचान स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।

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