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52 शक्तिपीठ

उमा (वृंदावन)

52 शक्तिपीठ में क्रम 32 — वृंदावन, मथुरा, उत्तर प्रदेश

उमा (वृंदावन)

उमा (कात्यायनी)

📍 वृंदावन, मथुरा, उत्तर प्रदेश

🛕 पीठ-परिचय

व्यापक प्रचलित मान्यता
देवी (शक्ति) रूपउमा (कात्यायनी)
भैरवभूतेश
गिरा अंग/आभूषणकेश-गुच्छ (चूड़ामणि सहित)
आधुनिक स्थानवृंदावन, मथुरा, उत्तर प्रदेश
देशभारत

📖 इस पीठ की कथा

परंपरागत / पौराणिक कथा

मान्यता है कि ब्रज-भूमि वृंदावन में सती के केश-गुच्छ गिरे, जहाँ देवी उमा — कात्यायनी — रूप में पूजित हुईं। कृष्ण-भक्ति की राजधानी में शक्तिपीठ की उपस्थिति अर्थपूर्ण है: भागवत-परंपरा में गोपियों ने श्रीकृष्ण को पाने की कामना से यमुना-तट पर कात्यायनी-व्रत किया था — उसी परंपरा में राधाबाग का कात्यायनी पीठ प्रतिष्ठित है। भैरव-स्थान प्राचीन भूतेश्वर महादेव को प्राप्त है। यह पीठ दिखाता है कि वैष्णव-भूमि और शाक्त-परंपरा विरोधी नहीं, पूरक हैं।

🪔 मूल शक्तिपीठ-कथा (सती–दक्ष-यज्ञ प्रसंग) पढ़ें

परंपरागत (पौराणिक) कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव का वरण किया। दक्ष ने एक महायज्ञ रचा, जिसमें सभी देवता आमंत्रित हुए — पर शिव और सती को नहीं बुलाया गया। सती बिना निमंत्रण पितृगृह गईं, जहाँ दक्ष ने भरी सभा में शिव का घोर अपमान किया। पति-निंदा सुनकर सती ने उसी यज्ञ-वेदी के समक्ष योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी।

सती के देह-त्याग का समाचार पाकर शिव का शोक प्रलय बन गया। वीरभद्र ने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया, और शिव सती का पार्थिव शरीर कंधे पर उठाए तीनों लोकों में तांडव करने लगे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया।

मान्यता है कि सती के अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान "शक्तिपीठ" बन गए — प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप (शक्ति) में और शिव एक विशिष्ट भैरव रूप में रक्षक होकर विराजे। इस प्रकार शक्तिपीठ-परंपरा पूरे भारतवर्ष — और उसके पार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका तक — को एक देवी-देह के रूप में देखती है।

✨ महत्व

ब्रज का शक्तिपीठ; गोपियों के कात्यायनी-व्रत की भागवत-परंपरा से जुड़ा।

सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं। सूचियाँ ग्रंथ-परंपराओं (51/52/108) में भिन्न मिलती हैं; विवादित पहचान स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।

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