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52 शक्तिपीठ

भूतधात्री (युगाद्या)

52 शक्तिपीठ में क्रम 20 — क्षीरग्राम, मंगलकोट, पूर्व बर्धमान, पश्चिम बंगाल

भूतधात्री (युगाद्या)

भूतधात्री (युगाद्या)

📍 क्षीरग्राम, मंगलकोट, पूर्व बर्धमान, पश्चिम बंगाल

🛕 पीठ-परिचय

क्षेत्रीय परंपरा
देवी (शक्ति) रूपभूतधात्री (युगाद्या)
भैरवक्षीरखंडक
गिरा अंग/आभूषणदक्षिण पाद-अंगुष्ठ
आधुनिक स्थानक्षीरग्राम, मंगलकोट, पूर्व बर्धमान, पश्चिम बंगाल
देशभारत

📖 इस पीठ की कथा

परंपरागत / पौराणिक कथा

मान्यता है कि क्षीरग्राम में सती के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा — देवी यहाँ युगाद्या (युग के आदि से विद्यमान) और भूतधात्री (समस्त प्राणियों की धात्री) रूप में पूजित हैं; भैरव क्षीरखंडक कहलाते हैं। गाँव का नाम क्षीरग्राम देवी को क्षीर-भोग अर्पण की रीति से भी जुड़ा है। वैशाख संक्रांति का युगाद्या-उत्सव यहाँ की प्रसिद्ध परंपरा है — जल में वास करने वाली देवी के विग्रह का विशेष दर्शन इसी अवसर पर होता है। बंगाल के मंगलकाव्य साहित्य में भी युगाद्या का उल्लेख मिलता है।

🪔 मूल शक्तिपीठ-कथा (सती–दक्ष-यज्ञ प्रसंग) पढ़ें

परंपरागत (पौराणिक) कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव का वरण किया। दक्ष ने एक महायज्ञ रचा, जिसमें सभी देवता आमंत्रित हुए — पर शिव और सती को नहीं बुलाया गया। सती बिना निमंत्रण पितृगृह गईं, जहाँ दक्ष ने भरी सभा में शिव का घोर अपमान किया। पति-निंदा सुनकर सती ने उसी यज्ञ-वेदी के समक्ष योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी।

सती के देह-त्याग का समाचार पाकर शिव का शोक प्रलय बन गया। वीरभद्र ने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया, और शिव सती का पार्थिव शरीर कंधे पर उठाए तीनों लोकों में तांडव करने लगे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया।

मान्यता है कि सती के अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान "शक्तिपीठ" बन गए — प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप (शक्ति) में और शिव एक विशिष्ट भैरव रूप में रक्षक होकर विराजे। इस प्रकार शक्तिपीठ-परंपरा पूरे भारतवर्ष — और उसके पार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका तक — को एक देवी-देह के रूप में देखती है।

✨ महत्व

बर्धमान अंचल का प्राचीन पीठ; वैशाखी युगाद्या-उत्सव और जलवास-परंपरा।

सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं। सूचियाँ ग्रंथ-परंपराओं (51/52/108) में भिन्न मिलती हैं; विवादित पहचान स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।

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