कालिका (कालीघाट)
52 शक्तिपीठ में क्रम 21 — कालीघाट, कोलकाता, पश्चिम बंगाल
कालिका (कालीघाट)
✦ दक्षिणा कालिका ✦
📍 कालीघाट, कोलकाता, पश्चिम बंगाल
🛕 पीठ-परिचय
व्यापक प्रचलित मान्यता📖 इस पीठ की कथा
परंपरागत / पौराणिक कथामान्यता है कि आदि गंगा के तट पर सती के दाहिने पैर की अंगुलियाँ गिरीं — यहीं कालीघाट का कालीपीठ बना, जो बंगाल की काली-उपासना का हृदय है; कोलकाता नाम की एक व्युत्पत्ति भी "कालीक्षेत्र" से जोड़ी जाती है। गर्भगृह का विग्रह विलक्षण है — कसौटी पत्थर का मुखमंडल, विशाल त्रिनेत्र, स्वर्ण-जिह्वा। समीप नकुलेश्वर महादेव भैरव-स्थान हैं। काली पूजा और स्नानयात्रा पर यहाँ अपार जनसमूह उमड़ता है; बंगाल की श्यामासंगीत-साधना परंपरा की जड़ें इसी पीठ से पोषित मानी जाती हैं।
🪔 मूल शक्तिपीठ-कथा (सती–दक्ष-यज्ञ प्रसंग) पढ़ें
परंपरागत (पौराणिक) कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव का वरण किया। दक्ष ने एक महायज्ञ रचा, जिसमें सभी देवता आमंत्रित हुए — पर शिव और सती को नहीं बुलाया गया। सती बिना निमंत्रण पितृगृह गईं, जहाँ दक्ष ने भरी सभा में शिव का घोर अपमान किया। पति-निंदा सुनकर सती ने उसी यज्ञ-वेदी के समक्ष योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी।
सती के देह-त्याग का समाचार पाकर शिव का शोक प्रलय बन गया। वीरभद्र ने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया, और शिव सती का पार्थिव शरीर कंधे पर उठाए तीनों लोकों में तांडव करने लगे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया।
मान्यता है कि सती के अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान "शक्तिपीठ" बन गए — प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप (शक्ति) में और शिव एक विशिष्ट भैरव रूप में रक्षक होकर विराजे। इस प्रकार शक्तिपीठ-परंपरा पूरे भारतवर्ष — और उसके पार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका तक — को एक देवी-देह के रूप में देखती है।
✨ महत्व
बंगाल की काली-उपासना का केंद्रीय पीठ; कोलकाता की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा।
सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं। सूचियाँ ग्रंथ-परंपराओं (51/52/108) में भिन्न मिलती हैं; विवादित पहचान स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।