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52 शक्तिपीठ

त्रिपुर सुंदरी (माताबाड़ी)

52 शक्तिपीठ में क्रम 14 — माताबाड़ी, उदयपुर, त्रिपुरा

त्रिपुर सुंदरी (माताबाड़ी)

त्रिपुरेश्वरी (त्रिपुर सुंदरी)

📍 माताबाड़ी, उदयपुर, त्रिपुरा

🛕 पीठ-परिचय

व्यापक प्रचलित मान्यता
देवी (शक्ति) रूपत्रिपुरेश्वरी (त्रिपुर सुंदरी)
भैरवत्रिपुरेश
गिरा अंग/आभूषणदक्षिण पाद
आधुनिक स्थानमाताबाड़ी, उदयपुर, त्रिपुरा
देशभारत

📖 इस पीठ की कथा

परंपरागत / पौराणिक कथा

मान्यता है कि त्रिपुरा के उदयपुर में सती का दक्षिण पाद गिरा। माताबाड़ी का मंदिर जिस टीले पर है उसका आकार कछुए की पीठ-सा माना जाता है — इसीलिए यह "कूर्मपीठ" कहलाता है। पंद्रहवीं सदी के अंत में माणिक्य राजवंश द्वारा निर्मित इस मंदिर में देवी त्रिपुर सुंदरी की श्यामवर्ण प्रतिमा के साथ "छोटी माँ" की छोटी प्रतिमा भी पूजित है। पार्श्व का कल्याण सागर सरोवर अपनी संरक्षित मछलियों-कछुओं के लिए प्रसिद्ध है, और दीपावली का मेला पूर्वोत्तर के सबसे बड़े मेलों में गिना जाता है।

🪔 मूल शक्तिपीठ-कथा (सती–दक्ष-यज्ञ प्रसंग) पढ़ें

परंपरागत (पौराणिक) कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव का वरण किया। दक्ष ने एक महायज्ञ रचा, जिसमें सभी देवता आमंत्रित हुए — पर शिव और सती को नहीं बुलाया गया। सती बिना निमंत्रण पितृगृह गईं, जहाँ दक्ष ने भरी सभा में शिव का घोर अपमान किया। पति-निंदा सुनकर सती ने उसी यज्ञ-वेदी के समक्ष योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी।

सती के देह-त्याग का समाचार पाकर शिव का शोक प्रलय बन गया। वीरभद्र ने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया, और शिव सती का पार्थिव शरीर कंधे पर उठाए तीनों लोकों में तांडव करने लगे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया।

मान्यता है कि सती के अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान "शक्तिपीठ" बन गए — प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप (शक्ति) में और शिव एक विशिष्ट भैरव रूप में रक्षक होकर विराजे। इस प्रकार शक्तिपीठ-परंपरा पूरे भारतवर्ष — और उसके पार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका तक — को एक देवी-देह के रूप में देखती है।

✨ महत्व

पूर्वोत्तर का प्रमुख शक्तिपीठ; कूर्मपीठ परंपरा और दीपावली मेला।

सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं। सूचियाँ ग्रंथ-परंपराओं (51/52/108) में भिन्न मिलती हैं; विवादित पहचान स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।

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