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52 शक्तिपीठ

कुमारी (रत्नावली)

52 शक्तिपीठ में क्रम 43 — खानाकुल-कृष्णनगर, हुगली, पश्चिम बंगाल

कुमारी (रत्नावली)

कुमारी

📍 खानाकुल-कृष्णनगर, हुगली, पश्चिम बंगाल

🛕 पीठ-परिचय

क्षेत्रीय परंपरा
देवी (शक्ति) रूपकुमारी
भैरवशिव (घंटेश्वर)
गिरा अंग/आभूषणदक्षिण स्कंध (दायाँ कंधा)
आधुनिक स्थानखानाकुल-कृष्णनगर, हुगली, पश्चिम बंगाल
देशभारत

📖 इस पीठ की कथा

परंपरागत / पौराणिक कथा

मान्यता है कि रत्नावली क्षेत्र में सती का दायाँ कंधा (दक्षिण स्कंध) गिरा, जहाँ देवी कुमारी रूप में पूजित हुईं। हुगली जिले के खानाकुल-कृष्णनगर अंचल में रत्नाकर नदी के नाम-सूत्र से "रत्नावली" की संगति जोड़ी जाती है। यह अंचल बंगाल के भक्ति-इतिहास में भी प्रसिद्ध है। कुमारी-रूप की उपासना शाक्त परंपरा में विशेष है — नवरात्र में कुमारी-पूजन की जो रीति घर-घर होती है, उसकी पीठ-रूप प्रतिष्ठा यहाँ दिखती है। दुर्गापूजा और स्थानीय मेले इस पीठ की जीवित परंपरा हैं।

🪔 मूल शक्तिपीठ-कथा (सती–दक्ष-यज्ञ प्रसंग) पढ़ें

परंपरागत (पौराणिक) कथा के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध शिव का वरण किया। दक्ष ने एक महायज्ञ रचा, जिसमें सभी देवता आमंत्रित हुए — पर शिव और सती को नहीं बुलाया गया। सती बिना निमंत्रण पितृगृह गईं, जहाँ दक्ष ने भरी सभा में शिव का घोर अपमान किया। पति-निंदा सुनकर सती ने उसी यज्ञ-वेदी के समक्ष योगाग्नि में अपनी देह त्याग दी।

सती के देह-त्याग का समाचार पाकर शिव का शोक प्रलय बन गया। वीरभद्र ने दक्ष-यज्ञ का विध्वंस किया, और शिव सती का पार्थिव शरीर कंधे पर उठाए तीनों लोकों में तांडव करने लगे। सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा, तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया।

मान्यता है कि सती के अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान "शक्तिपीठ" बन गए — प्रत्येक पीठ पर देवी एक विशिष्ट रूप (शक्ति) में और शिव एक विशिष्ट भैरव रूप में रक्षक होकर विराजे। इस प्रकार शक्तिपीठ-परंपरा पूरे भारतवर्ष — और उसके पार पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, तिब्बत, श्रीलंका तक — को एक देवी-देह के रूप में देखती है।

✨ महत्व

हुगली अंचल का पीठ; कुमारी-पूजन परंपरा की पीठ-रूप प्रतिष्ठा।

सभी विवरण परंपरागत/पौराणिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत हैं। सूचियाँ ग्रंथ-परंपराओं (51/52/108) में भिन्न मिलती हैं; विवादित पहचान स्पष्ट अंकित है। आचार्य-समीक्षा लंबित।

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