मंगल कामना मंत्र
मंगल/शान्ति प्रार्थना (लोकप्रचलित; परवर्ती संस्कृत पाठ)
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
Om Sarve Bhavantu Sukhinah Sarve Santu Niramayah, Sarve Bhadrani Pashyantu Ma Kashchid Duhkha-bhag Bhavet
⏱️ एक मिनट में जानें
"सर्वे भवन्तु सुखिनः" भारतीय प्रार्थना-परंपरा का सबसे उदार स्वर है — इसमें अपने लिए कुछ नहीं माँगा गया। सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी शुभ देखें, कोई भी दुःख का भागी न हो। ध्यान देने योग्य ईमानदार तथ्य: यह श्लोक जितना प्रसिद्ध है, इसका प्राचीन स्रोत उतना ही अनिश्चित — इसे प्रायः "उपनिषद् शांतिपाठ" कह दिया जाता है, पर यह किसी प्रमुख उपनिषद् में प्राप्त नहीं होता। कुछ संकलन इसे गरुड़ पुराण आदि से जोड़ते हैं; सटीक प्राचीन स्रोत की पुष्टि लंबित है। भावना की महत्ता स्रोत-अनिश्चितता से घटती नहीं।
📖 विस्तार से समझें
देवता/विषय: कोई देवता-विशेष नहीं — विश्व-कल्याण की भावना
परंपरा: सभा-सत्संग समापन की व्यापक परंपरा
पदच्छेद
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख-भाग् भवेत्॥
शब्दार्थ (पद-पद अर्थ)
| सर्वे भवन्तु सुखिनः | सभी सुखी हों |
| सर्वे सन्तु निरामयाः | सभी रोग-रहित (निरामय) हों |
| सर्वे भद्राणि पश्यन्तु | सभी शुभ/कल्याणकारी देखें |
| मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत् | कोई भी दुःख का भागी न हो |
सरल अनुवाद
सभी सुखी हों, सभी स्वस्थ हों, सभी शुभ देखें; कोई दुःखी न हो।
विस्तृत भावार्थ
इस प्रार्थना की संरचना पर ध्यान दें — चारों चरणों में कर्ता "सर्वे" (सभी) है। "मैं", "हम", "हमारा परिवार", "हमारा देश" — कोई सीमित इकाई नहीं। भारतीय प्रार्थना-परंपरा में याचना के अनेक स्तर हैं: अपने लिए, परिवार के लिए, समुदाय के लिए — और यह श्लोक उस सीढ़ी का अन्तिम डण्डा है, जहाँ "अपना" शब्द ही विसर्जित हो जाता है। "वसुधैव कुटुम्बकम्" जिस दृष्टि का सूत्र है, यह उसी की प्रार्थना-मुद्रा है।
चार चरणों का क्रम भी विचारपूर्ण है: सुख (मन), निरामयता (शरीर), भद्र-दर्शन (दृष्टि — जो शुभ है उसे देख पाना), और दुःख से मुक्ति (समग्र)। "सर्वे भद्राणि पश्यन्तु" सूक्ष्मतम है — यह केवल शुभ "मिलने" की नहीं, शुभ "देख सकने" की प्रार्थना है; एक ही परिस्थिति में कोई मंगल देखता है, कोई अमंगल — दृष्टि का यह भेद ही सुख-दुःख की जड़ है।
स्रोत की ईमानदार स्थिति: यह श्लोक आधुनिक प्रार्थना-सभाओं, विद्यालयों और सत्संगों में "ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः" के साथ शांतिपाठ-रूप में रूढ़ हो गया है, पर वैदिक शांतिपाठों (सह नाववतु, पूर्णमदः आदि) की तरह इसका कोई प्रमाणित प्राचीन सन्दर्भ अभी उपलब्ध नहीं है — कुछ संकलन गरुड़ पुराण या नीति-संग्रहों की ओर संकेत करते हैं (सत्यापन लंबित)। यह उदाहरण सिखाता है कि परंपरा जीवित प्रवाह है: श्रद्धेय पाठ हर युग में जुड़ते रहे हैं, और उनकी प्रामाणिकता उनके भाव से आँकी जाती रही है।
उच्चारण मार्गदर्शन
- ✦निरामयाः — नि-रा-म-याः, अन्त्य विसर्ग।
- ✦"मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्" — "भाग्" में ग् हलन्त; अगले "भ" से मिलाकर सहज सन्धि।
परंपरागत प्रयोग
- ✦सभा, सत्संग, पाठ और विद्यालय-प्रार्थना के समापन में (व्यापक प्रचलित परंपरा)।
- ✦शुभ अवसरों के आशीर्वचन में (लोकपरंपरा)।
ये परंपरागत प्रसंग हैं — कोई भी प्रयोग "सबके लिए अनिवार्य" नहीं है।
आध्यात्मिक भाव
- ✦सबके कल्याण की भावना
- ✦उदारता और मैत्री का भाव
🔬 गहन अध्ययन
स्रोत-विवेचन
सटीक प्राचीन स्रोत की पुष्टि लंबित है; यह पाठ व्यापक लोक/प्रार्थना परंपरा में प्रचलित है। "उपनिषद् शांतिपाठ" कहना तथ्यतः अशुद्ध है — प्रमुख उपनिषदों में यह प्राप्त नहीं। कुछ संकलनों में गरुड़ पुराण आदि की ओर संकेत (असत्यापित)।
स्रोत-लेबल: व्यापक प्रचलित मान्यता / सत्यापन लंबित
अंतिम समीक्षा: 2026-07-25 · संस्करण 1.0
समीक्षा स्थिति: आचार्य-समीक्षा लंबित (सामग्री-लेखन: संपादकीय)
अनुवाद स्थिति (en): मशीन अनुवाद — मानव संपादन लंबित