पूर्णमदः (शांतिपाठ)
उपनिषद् शांतिपाठ (शुक्ल यजुर्वेदीय)
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
Om Purnamadah Purnamidam Purnat Purnamudachyate, Purnasya Purnamadaya Purnamevavashishyate
⏱️ एक मिनट में जानें
"पूर्णमदः पूर्णमिदम्" ईशावास्य उपनिषद् का शांतिपाठ है और बृहदारण्यक (5.1.1) में मंत्र-रूप में प्राप्त है। यह गणित की भाषा में अध्यात्म कहता है: वह (परम तत्त्व) पूर्ण है; यह (जगत्) पूर्ण है; पूर्ण से पूर्ण निकलता है; और पूर्ण में से पूर्ण निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है। साधारण अंकगणित में पूरे में से पूरा निकालो तो शून्य बचता है — यहाँ पूर्ण बचता है। यही इस मंत्र की चुनौती और गहराई है: अनन्त का गणित सान्त के नियमों से नहीं चलता।
📖 विस्तार से समझें
देवता/विषय: कोई देवता-विशेष नहीं — पूर्ण ब्रह्म का चिंतन
परंपरा: ईशावास्य एवं बृहदारण्यक की पाठ-परंपरा का शांतिपाठ
पदच्छेद
पूर्णम् अदः पूर्णम् इदम् पूर्णात् पूर्णम् उदच्यते। पूर्णस्य पूर्णम् आदाय पूर्णम् एव अवशिष्यते॥
शब्दार्थ (पद-पद अर्थ)
| पूर्णम् अदः | वह (परोक्ष — ब्रह्म) पूर्ण है |
| पूर्णम् इदम् | यह (प्रत्यक्ष — जगत्) पूर्ण है |
| पूर्णात् पूर्णम् उदच्यते | पूर्ण से पूर्ण प्रकट होता है |
| पूर्णस्य पूर्णम् आदाय | पूर्ण में से पूर्ण लेकर भी |
| पूर्णम् एव अवशिष्यते | पूर्ण ही शेष रहता है |
सरल अनुवाद
वह पूर्ण है, यह पूर्ण है; पूर्ण से पूर्ण उत्पन्न होता है; पूर्ण का पूर्ण लेकर भी पूर्ण ही शेष रहता है।
विस्तृत भावार्थ
"अदः" (वह) और "इदम्" (यह) — मंत्र का पूरा तनाव इन दो सर्वनामों में है। "वह" यानी परोक्ष, इन्द्रियों से परे परम तत्त्व; "यह" यानी प्रत्यक्ष, अनुभव में आता जगत्। सामान्य धार्मिक चिन्तन इनमें ऊँच-नीच करता है — "वह" पूर्ण, "यह" अपूर्ण/माया/त्याज्य। मंत्र दोनों को एक ही साँस में "पूर्ण" कहता है। जगत् ब्रह्म का घटाव नहीं, प्रकटीकरण है — जैसे दीपक से जली दूसरी लौ पहले दीपक को घटाती नहीं।
यहीं "उदच्यते" (उमड़ना, प्रकट होना) शब्द की सुन्दरता है — सृष्टि "बनाई" नहीं गई, पूर्ण से "उमड़ी" है। और फिर चौथा चरण, जो तर्क की सीमा पर खड़ा है: पूर्ण में से पूर्ण "लेने" पर भी पूर्ण शेष। शंकर-भाष्य परंपरा इसे इस तरह खोलती है: ब्रह्म देश-काल से सीमित नहीं, इसलिए उसमें से कुछ भी "निकलना" उसे घटा नहीं सकता; घटना-बढ़ना सीमित वस्तुओं का धर्म है (भाष्य परंपरा)। आधुनिक पाठक के लिए अनन्त-राशि (infinity) की उपमा सहायक है — अनन्त में से अनन्त घटाओ, अनन्त रह सकता है — पर यह केवल उपमा है, प्रमाण नहीं।
शांतिपाठ के रूप में इसका प्रयोजन मनोवैज्ञानिक भी है: ईशावास्य जैसे ग्रंथ के अध्ययन से पहले चित्त को "अभाव-भाव" से निकालकर "पूर्णता-भाव" में रखना। जो अध्ययन अभाव से आरम्भ होता है — कुछ पाना है, कुछ कम है — वह लोभ की छाया में चलता है; जो पूर्णता के बोध से आरम्भ होता है, वह कृतज्ञता में। दैनिक जीवन के लिए भी परंपरा यही भाव सुझाती है: सन्तोष अभाव का इनकार नहीं, पूर्णता की स्मृति है।
उच्चारण मार्गदर्शन
- ✦पूर्-ण-म-दः — "अदः" के विसर्ग पर हल्का विराम।
- ✦उदच्यते — उ-दच्-य-ते; अवशिष्यते — अ-व-शिष्-य-ते।
परंपरागत प्रयोग
- ✦ईशावास्य/बृहदारण्यक पाठ का शांतिपाठ (परंपरागत प्रयोग)।
- ✦वेदान्त-प्रवचनों का मंगलाचरण (परंपरागत प्रयोग)।
- ✦सन्तोष/पूर्णता-भाव के चिंतन में (लोक-व्यवहार)।
ये परंपरागत प्रसंग हैं — कोई भी प्रयोग "सबके लिए अनिवार्य" नहीं है।
आध्यात्मिक भाव
- ✦पूर्णता और संतोष का चिंतन
- ✦वेदांत-दर्शन का प्रवेश
🔬 गहन अध्ययन
स्रोत-विवेचन
मूल ग्रंथ: बृहदारण्यक उपनिषद् 5.1.1; ईशावास्योपनिषद् का शांतिपाठ (शुक्ल यजुर्वेद परंपरा)। शंकर-भाष्य: बृहदारण्यक-भाष्य 5.1.1 (भाष्य परंपरा)।
स्रोत-लेबल: मूल ग्रंथ
अंतिम समीक्षा: 2026-07-25 · संस्करण 1.0
समीक्षा स्थिति: आचार्य-समीक्षा लंबित (सामग्री-लेखन: संपादकीय)
अनुवाद स्थिति (en): मशीन अनुवाद — मानव संपादन लंबित