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मंत्र — गहन अध्ययन

त्वमेव माता

समर्पण श्लोक (लोकप्रचलित; पाण्डव गीता-परंपरा)

त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥

Tvameva Mata Cha Pita Tvameva, Tvameva Bandhush Cha Sakha Tvameva, Tvameva Vidya Dravinam Tvameva, Tvameva Sarvam Mama Devadeva

सत्यापन लंबितसमर्पण श्लोक (लोकप्रचलित; पाण्डव गीता-परंपरा)

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"त्वमेव माता च पिता त्वमेव..." भारत के सबसे व्यापक समर्पण-श्लोकों में है — आरती के अन्त में, विद्यालयों की प्रार्थना में, घर-घर में। परंपरा इसे "पाण्डव गीता" नामक संकलन-ग्रंथ से जोड़ती है (सत्यापन लंबित)। इसकी शक्ति इसकी सर्व-स्वीकार्यता में है: इसमें किसी देवता का नाम नहीं — "देवदेव" मात्र सम्बोधन है — इसलिए हर परंपरा का उपासक इसे अपने इष्ट के लिए पढ़ सकता है। सात सम्बन्ध गिनाकर श्लोक कहता है: मेरा सब कुछ तुम्हीं हो।

📖 विस्तार से समझें

देवता/विषय: इष्ट/परमात्मा — किसी नाम-विशेष के बिना

परंपरा: आरती-समापन और प्रार्थना-सभाओं की व्यापक परंपरा

पदच्छेद

त्वम् एव माता च पिता त्वम् एव, त्वम् एव बन्धुः च सखा त्वम् एव। त्वम् एव विद्या द्रविणं त्वम् एव, त्वम् एव सर्वं मम देव-देव॥

शब्दार्थ (पद-पद अर्थ)

त्वम् एवतुम ही (एव = ही — प्रत्येक चरण में दुहराया गया निश्चय)
माता च पितामाता और पिता
बन्धुः च सखाबन्धु (सम्बन्धी) और सखा (मित्र)
विद्या द्रविणम्विद्या और धन
सर्वं मममेरा सब कुछ
देवदेवहे देवों के देव

सरल अनुवाद

हे देवदेव! तुम ही मेरी माता हो, तुम ही पिता; तुम ही बन्धु, तुम ही सखा; तुम ही विद्या, तुम ही धन; तुम ही मेरा सर्वस्व हो।

विस्तृत भावार्थ

श्लोक की सूची मनोवैज्ञानिक क्रम में चलती है — मनुष्य जिन-जिन आश्रयों पर जीवन टिकाता है, एक-एक कर सब गिनाए गए हैं: माता-पिता (जन्म का आश्रय), बन्धु-सखा (समाज का आश्रय), विद्या (बुद्धि का आश्रय), द्रविण/धन (लोक-व्यवहार का आश्रय)। और हर आश्रय के आगे "त्वमेव" — तुम ही। भाव यह नहीं कि माता-पिता या मित्र मिथ्या हैं; भाव यह है कि इन सब रूपों में जो आश्रय-तत्त्व है, उसका मूल एक ही है। सम्बन्ध नकारे नहीं गए — एक केन्द्र में समर्पित किए गए हैं।

"एव" (ही) की आठ आवृत्तियाँ इस श्लोक का हृदय हैं। संस्कृत काव्य में यह पुनरुक्ति अलंकार-दोष नहीं, निश्चय की घोषणा है — जैसे कोई काँपते हाथों से बार-बार एक ही खूँटी पकड़े। इसीलिए यह श्लोक विशेषतः असहायता के क्षणों में लोक-कण्ठ पर आता है — जब अन्य सब आश्रय छूटते दिखते हैं।

प्रयोग-परंपरा में यह श्लोक प्रायः आरती के बाद क्षमा-प्रार्थना के साथ बोला जाता है — पूजा के समापन पर यह स्वीकार कि विधि में जो कमी रही हो, वह सम्बन्ध से ढँक जाए: पूजा विधि से, समापन प्रेम से। किसी सम्प्रदाय-विशेष का न होना इसकी दुर्बलता नहीं, शक्ति है — यह उन थोड़े-से पाठों में है जो शैव, वैष्णव, शाक्त, सौर — सबकी सन्ध्या में समान भाव से बोले जाते हैं।

उच्चारण मार्गदर्शन

  • त्व-मे-व — "त्व" संयुक्त; सहज लय।
  • द्रविणं — द्र-वि-णं ("ण" मूर्धन्य)।

परंपरागत प्रयोग

  • आरती के समापन पर (व्यापक लोकपरंपरा)।
  • विद्यालय/सभा की प्रार्थना (आधुनिक व्यापक प्रयोग)।
  • रात्रि-स्मरण एवं शरणागति-भाव के पाठ में (लोकपरंपरा)।

ये परंपरागत प्रसंग हैं — कोई भी प्रयोग "सबके लिए अनिवार्य" नहीं है।

आध्यात्मिक भाव

  • समर्पण और विश्वास का भाव

🔬 गहन अध्ययन

स्रोत-विवेचन

पाण्डव गीता (प्रपन्न गीता) नामक परंपरागत संकलन में प्राप्त कहा जाता है — संकलन-ग्रंथ की तिथि/कर्तृत्व अनिश्चित (सत्यापन लंबित)। वर्तमान प्रचलन: आरती-पुस्तिकाओं एवं प्रार्थना-संग्रहों में सर्वत्र (व्यापक प्रचलित मान्यता)।

स्रोत-लेबल: व्यापक प्रचलित मान्यता / सत्यापन लंबित

अंतिम समीक्षा: 2026-07-25 · संस्करण 1.0

समीक्षा स्थिति: आचार्य-समीक्षा लंबित (सामग्री-लेखन: संपादकीय)

अनुवाद स्थिति (en): मशीन अनुवाद — मानव संपादन लंबित

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