गुरु वंदना
स्तुति श्लोक (गुरुगीता परंपरा)
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥
Gurur Brahma Gurur Vishnuh Gurur Devo Maheshwarah, Guruh Sakshat Parabrahma Tasmai Shri Gurave Namah
⏱️ एक मिनट में जानें
"गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः..." गुरु-वंदना का सर्वाधिक प्रचलित श्लोक है। परंपरा इसे गुरुगीता (स्कन्द पुराण से सम्बद्ध ग्रंथ) से जोड़ती है। अर्थ: गुरु ही ब्रह्मा हैं (ज्ञान के सृजनकर्ता), गुरु ही विष्णु (ज्ञान के पालक), गुरु ही महेश्वर (अज्ञान के संहारक); गुरु साक्षात् परब्रह्म हैं — उन्हें नमन। यहाँ व्यक्ति-पूजा नहीं, गुरु-"तत्त्व" की वंदना है — वह प्रकाश जो किसी भी माध्यम से हम तक ज्ञान पहुँचाता है।
📖 विस्तार से समझें
देवता/विषय: गुरु-तत्त्व
परंपरा: गुरु-शिष्य परंपरा — सभी सम्प्रदायों में प्रचलित
पदच्छेद
गुरुः ब्रह्मा गुरुः विष्णुः गुरुः देवः महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री-गुरवे नमः॥
शब्दार्थ (पद-पद अर्थ)
| गुरुः ब्रह्मा | गुरु ब्रह्मा हैं — शिष्य में ज्ञान का सृजन करते हैं |
| गुरुः विष्णुः | गुरु विष्णु हैं — ज्ञान का पालन-पोषण करते हैं |
| गुरुः देवः महेश्वरः | गुरु महेश्वर हैं — अज्ञान का संहार करते हैं |
| साक्षात् परब्रह्म | प्रत्यक्ष परम तत्त्व |
| तस्मै श्रीगुरवे नमः | उन श्री गुरु को नमन |
सरल अनुवाद
गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर हैं; गुरु साक्षात् परब्रह्म हैं — ऐसे श्री गुरु को नमन।
विस्तृत भावार्थ
श्लोक की त्रिमूर्ति-योजना शिक्षण की तीन अवस्थाएँ हैं। ब्रह्मा — सृजन: गुरु शिष्य में वह जिज्ञासा और समझ रचता है जो पहले थी ही नहीं। विष्णु — पालन: सीखा हुआ बिखर न जाए, इसके लिए अभ्यास, अनुशासन और प्रोत्साहन। महेश्वर — संहार: और यह सबसे कठिन कार्य है — शिष्य की जड़ धारणाओं, अहंकार और भ्रमों को तोड़ना। जो केवल सिखाता है और कभी तोड़ता नहीं, वह परंपरा की दृष्टि में अधूरा गुरु है।
"गुरुः साक्षात् परब्रह्म" को व्यक्ति-पूजा की तरह पढ़ना भूल है — और इस भूल से परंपरा स्वयं सावधान करती रही है। "गुरु" शब्द की प्रचलित परंपरागत व्याख्या है: "गु" = अन्धकार, "रु" = हटाने वाला (गुरुगीता परंपरा)। अर्थात् गुरु वह "तत्त्व" है जो अन्धकार हटाता है — वह किसी व्यक्ति में प्रकट हो सकता है, ग्रंथ में, अनुभव में, या भीतर की सूझ में। श्लोक उस तत्त्व को परब्रह्म कहता है, क्योंकि ज्ञान का अन्तिम स्रोत वही है; देह-धारी शिक्षक उसका माध्यम है, स्वामी नहीं।
व्यावहारिक विवेक: इस श्लोक का दुरुपयोग भी हुआ है — "गुरु परब्रह्म है" कहकर अन्ध-समर्पण माँगने वाले भी मिलते हैं। परंपरा का सन्तुलित स्वर याद रखें: शास्त्र गुरु की परीक्षा करने का अधिकार शिष्य को देते हैं, और सच्चा गुरु स्वयं को नहीं, तत्त्व को पुजवाता है। गुरु पूर्णिमा पर इस श्लोक के साथ अपने सभी ज्ञान-दाताओं — माता-पिता से लेकर पुस्तकों तक — का स्मरण करने की परंपरा इसका स्वस्थ रूप है।
उच्चारण मार्गदर्शन
- ✦गु-रुर्-ब्रह्-मा — सन्धि-रूप सहज रखें।
- ✦तस्मै श्री-गु-र-वे न-मः — "गुरवे" चतुर्थी रूप है।
परंपरागत प्रयोग
- ✦गुरु पूर्णिमा (व्यास पूर्णिमा) की वंदना (परंपरागत प्रयोग)।
- ✦अध्ययन, सत्संग, कथा के आरम्भ में (व्यापक परंपरा)।
- ✦दीक्षा/विद्यारम्भ प्रसंगों में (परंपरागत प्रयोग)।
ये परंपरागत प्रसंग हैं — कोई भी प्रयोग "सबके लिए अनिवार्य" नहीं है।
आध्यात्मिक भाव
- ✦गुरु के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा का भाव
🔬 गहन अध्ययन
स्रोत-विवेचन
गुरुगीता (स्कन्द पुराण से सम्बद्ध परंपरागत ग्रंथ) में प्राप्त पाठ-परंपरा; सटीक श्लोक-क्रमांक संस्करण-भेद से भिन्न (सत्यापन लंबित)। "गु-रु" निर्वचन: गुरुगीता परंपरा (परंपरागत व्याख्या)।
स्रोत-लेबल: परंपरागत पाठ (गुरुगीता परंपरा)
अंतिम समीक्षा: 2026-07-25 · संस्करण 1.0
समीक्षा स्थिति: आचार्य-समीक्षा लंबित (सामग्री-लेखन: संपादकीय)
अनुवाद स्थिति (en): मशीन अनुवाद — मानव संपादन लंबित