सह नाववतु (शांतिपाठ)
उपनिषद् शांतिपाठ (कृष्ण यजुर्वेदीय)
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
Om Saha Navavatu, Saha Nau Bhunaktu, Saha Viryam Karavavahai, Tejasvi Navadhitamastu Ma Vidvishavahai
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"सह नाववतु" कृष्ण यजुर्वेदीय उपनिषदों (कठ, तैत्तिरीय आदि) का शांतिपाठ है — अध्ययन आरम्भ से पहले गुरु और शिष्य मिलकर इसे बोलते हैं। पाँच वाक्य: हम दोनों की साथ रक्षा हो; हम साथ पोषित हों; हम साथ पुरुषार्थ करें; हमारा अध्ययन तेजस्वी हो; हम परस्पर द्वेष न करें। अन्तिम वाक्य इस प्रार्थना का शिखर है — विद्या के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा अज्ञान नहीं, गुरु-शिष्य के बीच का द्वेष माना गया।
📖 विस्तार से समझें
देवता/विषय: कोई देवता-विशेष नहीं — गुरु-शिष्य की साझी प्रार्थना
परंपरा: कठ, तैत्तिरीय, श्वेताश्वतर आदि उपनिषदों का पारम्परिक शांतिपाठ
पदच्छेद
सह नौ अवतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नौ अधीतम् अस्तु। मा विद्विषावहै॥
शब्दार्थ (पद-पद अर्थ)
| सह नौ अवतु | हम दोनों की साथ-साथ रक्षा हो |
| सह नौ भुनक्तु | हम दोनों का साथ-साथ पालन/पोषण हो |
| सह वीर्यं करवावहै | हम साथ मिलकर सामर्थ्य/पुरुषार्थ करें |
| तेजस्वि नौ अधीतम् अस्तु | हमारा पढ़ा हुआ तेजस्वी (प्रकाशमान, फलवान) हो |
| मा विद्विषावहै | हम परस्पर द्वेष न करें |
सरल अनुवाद
हम दोनों की साथ रक्षा हो, साथ पोषण हो; हम साथ पुरुषार्थ करें; हमारा अध्ययन तेजस्वी हो; हम आपस में द्वेष न करें। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
विस्तृत भावार्थ
यह शांतिपाठ शिक्षा का सम्पूर्ण दर्शन पाँच वाक्यों में रखता है। पहला सूत्र "सह" (साथ) की पुनरावृत्ति है — रक्षा साथ, पोषण साथ, श्रम साथ। वैदिक शिक्षा-दृष्टि में ज्ञान एकतरफा "देना-लेना" नहीं; गुरु-शिष्क दोनों एक ही यात्रा के सहयात्री हैं, दोनों को रक्षा और पोषण चाहिए — गुरु को भी। आधुनिक शिक्षा-शास्त्र जिस "सहभागी अधिगम" तक बीसवीं शती में पहुँचा, यह प्रार्थना उसे सहस्राब्दियों से दोहरा रही है।
"तेजस्वि नावधीतमस्तु" — हमारा पढ़ा हुआ "तेजस्वी" हो — असाधारण माँग है। पढ़ा हुआ निस्तेज भी हो सकता है: रटा हुआ, अनुभव में न उतरा हुआ, केवल परीक्षा के लिए। तेजस्वी अध्ययन वह है जो जीवन में प्रकाश बने। प्रार्थना अंक या उपाधि नहीं माँगती — विद्या की जीवन्तता माँगती है।
और अन्त में — "मा विद्विषावहै।" परंपरा ने विद्या-मार्ग की सबसे यथार्थ बाधा पहचानी: सम्बन्ध का बिगड़ना। ज्ञान के आदान-प्रदान में अहंकार दोनों ओर से आ सकता है — गुरु का श्रेष्ठता-भाव, शिष्य का प्रतिस्पर्धा-भाव। जहाँ द्वेष है, वहाँ प्रश्न पूछना बन्द हो जाता है, और जहाँ प्रश्न बन्द, वहाँ विद्या बन्द। तीन बार "शान्तिः" कहने की परंपरागत व्याख्या — आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक — तीनों स्तरों के विघ्नों की शान्ति — इस पाठ के साथ विशेष अर्थ पाती है (भाष्य परंपरा)।
उच्चारण मार्गदर्शन
- ✦नाववतु = नौ + अवतु (सन्धि); "नौ" का अर्थ "हम दोनों को"।
- ✦करवावहै, विद्विषावहै — "वहै" अन्त वाले रूप "हम दोनों" (आत्मनेपद द्विवचन) के हैं; धीरे अभ्यास करें।
परंपरागत प्रयोग
- ✦अध्ययन/पाठ आरम्भ से पूर्व गुरु-शिष्य द्वारा (वैदिक परंपरा)।
- ✦कठ, तैत्तिरीय, श्वेताश्वतर उपनिषद् एवं सम्बद्ध भाष्यों के पाठारम्भ में (परंपरागत प्रयोग)।
- ✦आधुनिक विद्यालयों/गुरुकुलों की प्रार्थना-सभाओं में (व्यापक प्रचलित परंपरा)।
ये परंपरागत प्रसंग हैं — कोई भी प्रयोग "सबके लिए अनिवार्य" नहीं है।
आध्यात्मिक भाव
- ✦सह-अध्ययन और सद्भाव का भाव
- ✦विद्या के प्रति श्रद्धा
🔬 गहन अध्ययन
स्रोत-विवेचन
मूल ग्रंथ: कृष्ण यजुर्वेदीय शांतिपाठ — तैत्तिरीय उपनिषद् (ब्रह्मानन्दवल्ली/भृगुवल्ली के आरम्भ) एवं कठ उपनिषद् की पाठ-परंपरा में; तैत्तिरीय आरण्यक की धारा से। शंकर-भाष्य परंपरा में भी यही शांतिपाठ पूर्वक पढ़ा जाता है (भाष्य परंपरा)।
स्रोत-लेबल: मूल ग्रंथ
अंतिम समीक्षा: 2026-07-25 · संस्करण 1.0
समीक्षा स्थिति: आचार्य-समीक्षा लंबित (सामग्री-लेखन: संपादकीय)
अनुवाद स्थिति (en): मशीन अनुवाद — मानव संपादन लंबित