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मंत्र — गहन अध्ययन

स्वस्ति मंत्र

वैदिक मंत्र (स्वस्ति-वाचन)

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

Om Swasti Na Indro Vriddhashravah Swasti Nah Pusha Vishvavedah, Swasti Nas Tarkshyo Arishtanemih Swasti No Brihaspatir Dadhatu

मूल ग्रंथवैदिक मंत्र (स्वस्ति-वाचन)

⏱️ एक मिनट में जानें

"स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः..." ऋग्वेद (1.89.6) का मंत्र है — उसी प्रसिद्ध सूक्त से जिसमें "आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः" (हमें सब ओर से कल्याणकारी विचार प्राप्त हों) आता है। चार देवताओं से "स्वस्ति" (कल्याण) की प्रार्थना है: महान कीर्ति वाले इन्द्र, सर्वज्ञ पूषा, अरिष्टनेमि तार्क्ष्य और बृहस्पति। विवाह, गृह-प्रवेश, यज्ञ — हर मांगलिक कार्य के आरम्भ में पण्डित जो "स्वस्ति-वाचन" करते हैं, यह उसका केन्द्रीय मंत्र है। "स्वस्तिक" चिह्न भी इसी "स्वस्ति" (सु+अस्ति = शुभ हो) से जुड़ा शब्द है।

📖 विस्तार से समझें

देवता/विषय: इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य (गरुड़), बृहस्पति

ऋषि: गोतम राहूगण (ऋग्वेद 1.89 — अनुक्रमणी परंपरा)

छन्द: जगती (अनुक्रमणी परंपरा)

परंपरा: मांगलिक कार्यों का स्वस्ति-वाचन

पदच्छेद

स्वस्ति नः इन्द्रः वृद्ध-श्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्व-वेदाः। स्वस्ति नः तार्क्ष्यः अरिष्ट-नेमिः स्वस्ति नः बृहस्पतिः दधातु॥

शब्दार्थ (पद-पद अर्थ)

स्वस्तिकल्याण, क्षेम (सु + अस्ति = "अच्छा हो")
नःहमारे लिए
इन्द्रः वृद्धश्रवाःमहान कीर्ति (श्रवस्) वाले इन्द्र
पूषा विश्ववेदाःसब कुछ जानने वाले पूषा (पोषण के देवता)
तार्क्ष्यः अरिष्टनेमिःअटूट नेमि (पहिये की धार) वाले तार्क्ष्य — परंपरा में गरुड़
बृहस्पतिः दधातुबृहस्पति (देव-गुरु) धारण करें/प्रदान करें

सरल अनुवाद

महाकीर्ति इन्द्र, सर्वज्ञ पूषा, अरिष्टनेमि तार्क्ष्य और बृहस्पति — ये सब हमारे लिए कल्याण धारण करें।

विस्तृत भावार्थ

चार देवताओं का चयन विचारपूर्ण है, और परंपरागत व्याख्या इसमें जीवन के चार आधार पढ़ती है: इन्द्र — बल और नेतृत्व; पूषा — पोषण और मार्ग (पूषा यात्रा-मार्गों के देवता भी हैं); तार्क्ष्य अरिष्टनेमि — वह वाहन-शक्ति जिसकी "नेमि" (पहिये की धार) कभी टूटती नहीं, अर्थात् निर्विघ्न गति; और बृहस्पति — विवेक और वाणी। बल, पोषण, गति, विवेक — किसी भी शुभ कार्य की चार शर्तें। स्वस्ति-वाचन इन चारों का आवाहन है।

"स्वस्ति" शब्द स्वयं ध्यान देने योग्य है — सु (शुभ) + अस्ति (है/हो): "भला हो।" यह भारतीय अभिवादन-परंपरा का प्राचीनतम रूपों में है, और "स्वस्तिक" चिह्न इसी शुभ-कामना का रेखा-रूप है। इस तरह यह मंत्र शब्द, चिह्न और विधि — तीनों स्तरों पर भारतीय मंगल-परंपरा का मूल-स्रोत है।

प्रयोग-परंपरा: विवाह, उपनयन, गृह-प्रवेश, यज्ञ, ग्रंथ-आरम्भ — पुरोहित "स्वस्ति-वाचन" या "पुण्याह-वाचन" में यह और सहवर्ती मंत्र (आ नो भद्राः, भद्रं कर्णेभिः आदि) पढ़ते हैं। भाव है: कार्य के आरम्भ में समस्त उपस्थित जनों की सम्मति से शुभ की सामूहिक घोषणा। ध्यान दें — प्रार्थना "दधातु" (धारण करें/दें) कहती है; अर्थात् कल्याण "माँगा" जा रहा है, कार्य की सफलता का दावा नहीं किया जा रहा। वैदिक प्रार्थना-शैली की यही मर्यादा है।

उच्चारण मार्गदर्शन

  • वृद्-ध-श्र-वाः — संयुक्ताक्षर क्रमशः।
  • तार्क्ष्यः — तार्क्ष् + यः; कठिन संयुक्ताक्षर, धीरे अभ्यास करें।

परंपरागत प्रयोग

  • मांगलिक कार्यों का स्वस्ति-वाचन/पुण्याह-वाचन (वैदिक-पौरोहित्य परंपरा)।
  • यज्ञ एवं संस्कारों के आरम्भ में (परंपरागत प्रयोग)।
  • सभा-सम्मेलनों के मंगलाचरण में (व्यापक प्रचलित परंपरा)।

ये परंपरागत प्रसंग हैं — कोई भी प्रयोग "सबके लिए अनिवार्य" नहीं है।

आध्यात्मिक भाव

  • मंगल-कामना और शुभारंभ का भाव

🔬 गहन अध्ययन

स्रोत-विवेचन

मूल ग्रंथ: ऋग्वेद 1.89.6 (गोतम राहूगण का सूक्त); यही मंत्र वाजसनेयि संहिता 25.19 आदि में भी संकलित। स्वस्ति-वाचन विधि: गृह्यसूत्र/पौरोहित्य परंपरा।

स्रोत-लेबल: मूल ग्रंथ

अंतिम समीक्षा: 2026-07-25 · संस्करण 1.0

समीक्षा स्थिति: आचार्य-समीक्षा लंबित (सामग्री-लेखन: संपादकीय)

अनुवाद स्थिति (en): मशीन अनुवाद — मानव संपादन लंबित

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