सनातन ज्ञान
ज्ञान संसार
मंत्र — गहन अध्ययन

शुभं करोति (दीप मंत्र)

दीप-प्रार्थना (लोकपरंपरा)

शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यं धनसम्पदा। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥

Shubham Karoti Kalyanam Arogyam Dhana-sampada, Shatru-buddhi-vinashaya Deepa-jyotir Namostu Te

सत्यापन लंबितदीप-प्रार्थना (लोकपरंपरा)

⏱️ एक मिनट में जानें

"शुभं करोति कल्याणम्..." संध्या समय घर में दीप जलाते हुए बोला जाने वाला श्लोक है — प्रायः बच्चों को सिखाया जाने वाला पहला श्लोक। दीपज्योति को प्रणाम है, जिसे परंपरा शुभ, कल्याण, आरोग्य और सम्पदा करने वाली तथा "शत्रुबुद्धि" — भीतर के वैर-भाव — का विनाश करने वाली कहती है। दूसरा प्रचलित रूप "दीपज्योतिः परब्रह्म..." भी है। यह प्रतीक-भाषा है: दीया अँधेरा नहीं मिटाता जितना वह मन के भाव बदलता है — घर में साँझ का दीया जलते ही दिन का कोलाहल पूजा की शान्ति में मुड़ जाता है।

📖 विस्तार से समझें

देवता/विषय: दीपज्योति — प्रकाश का प्रतीक-रूप

परंपरा: संध्या दीप-प्रज्वलन की गृह-परंपरा (महाराष्ट्र-भारत भर में)

पदच्छेद

शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यं धन-सम्पदा। शत्रु-बुद्धि-विनाशाय दीप-ज्योतिः नमः अस्तु ते॥

शब्दार्थ (पद-पद अर्थ)

शुभं करोति(जो) शुभ करती है
कल्याणम् आरोग्यम्कल्याण और आरोग्य
धनसम्पदाधन-सम्पत्ति (की वृद्धि का प्रतीक)
शत्रुबुद्धिविनाशायशत्रु-बुद्धि (वैर-भाव, दुर्बुद्धि) के विनाश के लिए
दीपज्योतिः नमोऽस्तु तेहे दीप की ज्योति! तुम्हें नमस्कार

सरल अनुवाद

जो शुभ, कल्याण, आरोग्य और सम्पदा करती है, और शत्रु-बुद्धि का विनाश करती है — उस दीपज्योति को नमस्कार।

विस्तृत भावार्थ

श्लोक का सबसे गहरा शब्द "शत्रुबुद्धि" है — और ध्यान दें, "शत्रु का विनाश" नहीं कहा, "शत्रु-बुद्धि का विनाश" कहा। प्रार्थना यह नहीं कि मेरे विरोधी नष्ट हों; प्रार्थना यह है कि मेरे भीतर का वैर-भाव — दूसरों को शत्रु देखने की वृत्ति — नष्ट हो। एक बालक जो रोज़ साँझ यह श्लोक बोलता है, वह अनजाने ही यह संस्कार पाता है कि अन्धकार बाहर से अधिक भीतर होता है, और दीया दोनों के लिए है।

संध्या-दीप की गृह-परंपरा का समाजशास्त्र भी सुन्दर है: दिन ढलते ही घर की कोई सदस्य — प्रायः माँ या बच्चे — तुलसी या देव-स्थान पर दीप रखते हैं, और यह क्षण घर की लय बदल देता है। खेल, काम, कोलाहल — सब एक क्षण के लिए थमता है। आधुनिक भाषा में यह "दिन से रात का संक्रमण-अनुष्ठान" है; परंपरा की भाषा में — संध्या। बिजली के युग में दीये की आवश्यकता प्रकाश के लिए नहीं रही, भाव के लिए बनी हुई है।

स्रोत-स्थिति: यह लोकपरंपरा का श्लोक है — मराठी घरों की "शुभंकरोति" परंपरा में विशेष जीवित, और उत्तर-दक्षिण सर्वत्र प्रचलित; प्रमाणित प्राचीन ग्रंथ-सन्दर्भ उपलब्ध नहीं (सत्यापन लंबित)। "आरोग्य-धनसम्पदा" जैसे शब्द प्रतीक-स्तुति हैं, वचन नहीं — दीया जलाने से धन नहीं आता; दीया जलाने वाला घर जिस अनुशासन, स्वच्छता और सान्ध्य-शान्ति को साधता है, परंपरा उसी समग्र "श्री" की ओर संकेत करती है।

उच्चारण मार्गदर्शन

  • शु-भं क-रो-ति — सरल; बालकों के लिए उपयुक्त लय।
  • शत्रु-बुद्-धि-वि-ना-शा-य — लम्बा समास, टुकड़ों में सिखाएँ।

परंपरागत प्रयोग

  • संध्या दीप-प्रज्वलन पर (गृह-लोकपरंपरा)।
  • बालकों की सान्ध्य प्रार्थना (विशेषतः महाराष्ट्र की शुभंकरोति परंपरा)।
  • तुलसी-दीप एवं देव-स्थान के सान्ध्य दीपन में (लोकपरंपरा)।

ये परंपरागत प्रसंग हैं — कोई भी प्रयोग "सबके लिए अनिवार्य" नहीं है।

आध्यात्मिक भाव

  • प्रकाश और शुभता का भाव
  • संध्या की पारिवारिक परंपरा

🔬 गहन अध्ययन

स्रोत-विवेचन

लोकपरंपरा — प्रमाणित प्राचीन सन्दर्भ अनुपलब्ध (सत्यापन लंबित)। सहवर्ती प्रचलित पाठ: "दीपज्योतिः परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः..." (लोकपरंपरा)।

स्रोत-लेबल: लोकपरंपरा / सत्यापन लंबित

अंतिम समीक्षा: 2026-07-25 · संस्करण 1.0

समीक्षा स्थिति: आचार्य-समीक्षा लंबित (सामग्री-लेखन: संपादकीय)

अनुवाद स्थिति (en): मशीन अनुवाद — मानव संपादन लंबित

🔗 संबंधित सामग्री