सनातन ज्ञान
ज्ञान संसार
मंत्र — गहन अध्ययन

कराग्रे वसते (प्रातः स्मरण)

प्रातः-स्मरण श्लोक (लोकपरंपरा/आचार-संग्रह)

कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥

Karagre Vasate Lakshmih Karamadhye Saraswati, Karamule Tu Govindah Prabhate Kara-darshanam

सत्यापन लंबितप्रातः-स्मरण श्लोक (लोकपरंपरा/आचार-संग्रह)

⏱️ एक मिनट में जानें

"कराग्रे वसते लक्ष्मीः..." जागते ही, बिस्तर छोड़ने से पहले, अपनी दोनों हथेलियों को देखकर बोला जाने वाला श्लोक है। हथेली के अग्रभाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती, मूल में गोविन्द — तीनों का वास मानकर प्रातः "कर-दर्शन" की परंपरा है। पाठ-भेद भी प्रचलित है — "करमूले तु गोविन्दः" के स्थान पर "करमूले स्थितो ब्रह्मा" भी मिलता है। दिन का पहला दृश्य अपने ही हाथ हों — यह श्लोक कर्म-प्रधान जीवन-दृष्टि का सुन्दरतम लोक-रूप है।

📖 विस्तार से समझें

देवता/विषय: लक्ष्मी, सरस्वती, गोविन्द — हथेली में स्मरण

परंपरा: प्रातः-स्मरण की गृह-परंपरा

पदच्छेद

कर-अग्रे वसते लक्ष्मीः कर-मध्ये सरस्वती। कर-मूले तु गोविन्दः प्रभाते कर-दर्शनम्॥

शब्दार्थ (पद-पद अर्थ)

कराग्रेहाथ (हथेली) के अग्रभाग में — उँगलियों की ओर
वसतेवास करती हैं
लक्ष्मीःलक्ष्मी — श्री, समृद्धि
करमध्ये सरस्वतीहथेली के मध्य में सरस्वती — विद्या
करमूले तु गोविन्दःहथेली के मूल (मणिबन्ध की ओर) में गोविन्द (पाठ-भेद: ब्रह्मा)
प्रभाते करदर्शनम्इसलिए प्रातःकाल कर-दर्शन (करना चाहिए)

सरल अनुवाद

हथेली के अग्रभाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती और मूल में गोविन्द का वास है — इसलिए प्रातः अपनी हथेलियों का दर्शन करें।

विस्तृत भावार्थ

इस छोटे-से श्लोक में एक पूरी जीवन-दृष्टि है: जो कुछ पाना है — समृद्धि (लक्ष्मी), विद्या (सरस्वती), और ईश्वर-अनुग्रह (गोविन्द) — उसका पता कहीं बाहर नहीं, अपने ही हाथों में है। दिन की पहली दृष्टि न दर्पण पर, न (आज के युग में) मोबाइल पर — अपने कर्म-साधन पर। परंपरा ने इसे बालकों को सिखाया, क्योंकि यह संस्कार भाग्यवाद का प्रतिषेध है: तुम्हारा दिन तुम्हारे हाथ बनाएँगे।

तीनों देवताओं का स्थान-विन्यास भी अर्थ रखता है (परंपरागत व्याख्या): उँगलियों के अग्र — जो कर्म का सूक्ष्मतम स्पर्श करते हैं — वहाँ लक्ष्मी: समृद्धि परिश्रम के अग्रभाग पर बसती है। मध्य में सरस्वती: कर्म के केन्द्र में विवेक चाहिए। मूल में गोविन्द/ब्रह्मा: हर कर्म की जड़ में ईश्वर-स्मरण। कर्म, विवेक, श्रद्धा — तीनों एक हथेली में।

स्रोत-स्थिति ईमानदारी से: यह श्लोक प्रातः-स्मरण की आचार-पुस्तिकाओं और पंचांग-परंपरा में सर्वत्र मिलता है, पर किसी प्राचीन ग्रंथ का प्रमाणित सन्दर्भ उपलब्ध नहीं (सत्यापन लंबित); पाठ-भेद ("गोविन्दः"/"स्थितो ब्रह्मा") स्वयं इसकी लोक-यात्रा का प्रमाण है। लोकपरंपरा का पाठ होना इसकी गरिमा घटाता नहीं — करोड़ों घरों की पीढ़ियों ने इसी से दिन खोला है।

उच्चारण मार्गदर्शन

  • क-राग्-रे — कर+अग्रे की सन्धि।
  • प्र-भा-ते क-र-दर्-श-नम् — सहज लय; जागते ही मन्द स्वर पर्याप्त।

परंपरागत प्रयोग

  • प्रातः जागरण पर, बिस्तर में ही कर-दर्शन के साथ (लोकपरंपरा)।
  • बालकों के संस्कार-शिक्षण का आरम्भिक श्लोक (गृह-परंपरा)।

ये परंपरागत प्रसंग हैं — कोई भी प्रयोग "सबके लिए अनिवार्य" नहीं है।

आध्यात्मिक भाव

  • कर्म के प्रति सजगता
  • दिन के शुभारंभ का भाव

🔬 गहन अध्ययन

स्रोत-विवेचन

प्रातः-स्मरण लोकपरंपरा/आचार-संग्रह — प्रमाणित प्राचीन सन्दर्भ अनुपलब्ध (सत्यापन लंबित)। पाठ-भेद: "करमूले तु गोविन्दः" / "करमूले स्थितो ब्रह्मा" (दोनों प्रचलित)।

स्रोत-लेबल: लोकपरंपरा / सत्यापन लंबित

अंतिम समीक्षा: 2026-07-25 · संस्करण 1.0

समीक्षा स्थिति: आचार्य-समीक्षा लंबित (सामग्री-लेखन: संपादकीय)

अनुवाद स्थिति (en): मशीन अनुवाद — मानव संपादन लंबित

🔗 संबंधित सामग्री