दुर्गा स्तुति (नारायणि)
पौराणिक स्तुति श्लोक (देवीमाहात्म्य)
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
Sarva Mangala Mangalye Shive Sarvartha Sadhike, Sharanye Tryambake Gauri Narayani Namostu Te
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"सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके..." देवीमाहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) के 11वें अध्याय का प्रसिद्ध श्लोक है — देवताओं द्वारा की गई "नारायणी स्तुति" का अंश। महिषासुर आदि के वध के बाद देवता देवी की स्तुति करते हैं, और यही श्लोक उस स्तुति का सबसे लोकप्रिय पद बन गया। अर्थ: हे सब मंगलों की भी मंगलरूपा, कल्याणमयी शिवा, सब प्रयोजन सिद्ध करने वाली, शरण देने वाली, त्रिनेत्रा गौरी नारायणी — आपको नमस्कार। नवरात्रि और सप्तशती-पाठ में यह घर-घर गूँजता है।
📖 विस्तार से समझें
देवता/विषय: दुर्गा / नारायणी
परंपरा: शाक्त परंपरा; दुर्गा सप्तशती पाठ-परंपरा
पदच्छेद
सर्व-मङ्गल-माङ्गल्ये शिवे सर्व-अर्थ-साधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमः अस्तु ते॥
शब्दार्थ (पद-पद अर्थ)
| सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये | समस्त मंगलों की भी मंगलरूपा (सम्बोधन) |
| शिवे | हे कल्याणमयी (शिवा) |
| सर्वार्थसाधिके | समस्त प्रयोजनों को सिद्ध करने वाली |
| शरण्ये | शरण देने योग्य/शरणदात्री |
| त्र्यम्बके | हे तीन नेत्रों वाली |
| गौरि | हे गौरी (गौर वर्ण वाली; पार्वती) |
| नारायणि | हे नारायणी — नारायण की शक्ति-रूपा |
| नमोऽस्तु ते | तुम्हें नमस्कार हो |
सरल अनुवाद
हे सब मंगलों की मंगलरूपा, कल्याणमयी, सर्वार्थ सिद्ध करने वाली, शरणदात्री, त्रिनेत्रा गौरी नारायणी! तुम्हें नमस्कार।
विस्तृत भावार्थ
देवीमाहात्म्य का यह श्लोक जिस स्थान पर आता है, वह अर्थपूर्ण है — युद्ध के बाद। असुर पराजित हो चुके हैं; अब देवता विजय का श्रेय अपनी शक्ति को नहीं, देवी को देते हैं। स्तुति का पहला पद ही चरम है: देवी केवल मंगलकारी नहीं, "मंगलों का भी मंगल" हैं — जो शुभ है, उसकी शुभता जिस स्रोत से आती है, वह। यह दर्शन की भाषा में कहा गया भक्ति-वाक्य है: गुण जहाँ से गुणवान होते हैं, उस मूल की वंदना।
श्लोक में "शिवे" और "नारायणि" — दोनों सम्बोधन एक साथ हैं: देवी शिव की शक्ति (गौरी) भी हैं और नारायण की शक्ति (नारायणी) भी। शाक्त दृष्टि में यह कोई विरोधाभास नहीं — शक्ति एक है, देव-रूप उसके आश्रय हैं। इस तरह यह श्लोक शैव-वैष्णव-शाक्त धाराओं को एक वंदना में जोड़ देता है — शायद इसीलिए यह सप्तशती के सैकड़ों श्लोकों में से सबसे अधिक लोक-कण्ठ में बसा।
"सर्वार्थसाधिके" को ईमानदारी से पढ़ें: यह देवी का गुण-वर्णन है, पाठक को दिया गया वचन नहीं। परंपरा में इस श्लोक का पाठ शरणागति के भाव से होता है — "मैं अपने बूते के बाहर हूँ, तुम्हारी शरण में हूँ" — विशेषकर नवरात्रि, दुर्गाष्टमी और सप्तशती-पाठ के समापन पर। क्षमा-प्रार्थना (अपराध-क्षमापन स्तोत्र) के साथ इसका पाठ शाक्त विनय-परंपरा की सुंदर झलक है: शक्ति की उपासना अहंकार से नहीं, विनम्रता से।
उच्चारण मार्गदर्शन
- ✦सर्व-मङ्-ग-ल-माङ्-गल्-ये — अनुस्वार/ङ् की नासिक ध्वनियाँ धीरे साधें।
- ✦"गौरि" और "नारायणि" यहाँ सम्बोधन (हे गौरी! हे नारायणी!) हैं — इसलिए अन्त्य इ ह्रस्व है।
परंपरागत प्रयोग
- ✦दुर्गा सप्तशती पाठ और उसके समापन में (शाक्त परंपरा)।
- ✦नवरात्रि — दैनिक देवी-वंदना (परंपरागत प्रयोग)।
- ✦आरती/क्षमा-प्रार्थना के साथ (लोकपरंपरा)।
ये परंपरागत प्रसंग हैं — कोई भी प्रयोग "सबके लिए अनिवार्य" नहीं है।
जप-संख्या
सप्तशती-परंपरा में इसे स्तुति-पाठ के रूप में पढ़ा जाता है; जप-रूप में संख्या परिवार/परंपरा पर निर्भर है।
आध्यात्मिक भाव
- ✦परंपरा में इसे शरणागति और मातृ-भाव से जोड़ा जाता है
🔬 गहन अध्ययन
स्रोत-विवेचन
मूल ग्रंथ: देवीमाहात्म्य (मार्कण्डेय पुराण के अन्तर्गत), अध्याय 11 — नारायणी स्तुति; प्रचलित सप्तशती-संस्करणों में 11.10 के आसपास (संस्करण-भेद से श्लोक-क्रमांक 1-2 स्थान आगे-पीछे मिलता है)। पाठ-परंपरा: दुर्गा सप्तशती (गीता प्रेस आदि)।
स्रोत-लेबल: मूल ग्रंथ (पौराणिक)
अंतिम समीक्षा: 2026-07-25 · संस्करण 1.0
समीक्षा स्थिति: आचार्य-समीक्षा लंबित (सामग्री-लेखन: संपादकीय)
अनुवाद स्थिति (en): मशीन अनुवाद — मानव संपादन लंबित