योग दर्शन
पतंजलि का अष्टांग मार्ग — चित्त-वृत्ति-निरोध
योग दर्शन का मूल ग्रंथ है महर्षि पतंजलि का योगसूत्र — चार पादों (समाधि, साधन, विभूति, कैवल्य) में 195/196 सूत्र। दूसरा ही सूत्र पूरे शास्त्र की परिभाषा दे देता है: "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" — चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है। योग, सांख्य की तत्व-योजना को स्वीकार कर उसमें ईश्वर-प्रणिधान और व्यवस्थित साधना-क्रम जोड़ता है। व्यास का भाष्य इसकी प्रमुख व्याख्या है। आधुनिक विश्व में प्रचलित आसन-केंद्रित योग इस व्यापक शास्त्र का एक अंग मात्र है — पातंजल योग मूलतः चित्त-शुद्धि और ध्यान का विज्ञान है।
अष्टांग योग
यम
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह — सामाजिक संयम।
नियम
शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान — व्यक्तिगत अनुशासन।
आसन
"स्थिरसुखमासनम्" — स्थिर और सुखद बैठक।
प्राणायाम
श्वास-प्रश्वास की गति का नियमन।
प्रत्याहार
इंद्रियों का विषयों से लौटना।
धारणा
चित्त को एक देश (बिंदु) पर बाँधना।
ध्यान
उसी बिंदु पर वृत्ति का अखंड प्रवाह।
समाधि
ध्येय-मात्र का भासना — ध्याता-ध्यान का विलय; अंतिम तीन मिलकर "संयम"।
मूल अवधारणाएँ
चित्त-वृत्तियाँ
प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति — पाँच वृत्तियाँ; अभ्यास और वैराग्य से इनका निरोध।
पंच क्लेश
अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश — दुख के मूल; क्रिया-योग से इन्हें क्षीण करना।
ईश्वर-प्रणिधान
योगसूत्र में ईश्वर "क्लेश-कर्म से अछूता विशेष पुरुष" है; प्रणव (ॐ) उसका वाचक।
कैवल्य
गुणों से पुरुष की स्वरूप-प्रतिष्ठा — योग का चरम लक्ष्य।