वेदांग
छह अंग — वेद-अध्ययन के सहायक शास्त्र
वेदांग का अर्थ है "वेद के अंग" — वे छह शास्त्र जो वेद-मंत्रों के शुद्ध उच्चारण, सही अर्थ-बोध और यथासमय प्रयोग के लिए विकसित हुए। परंपरा में इन्हें वेद-पुरुष के अंगों की उपमा दी गई: शिक्षा नासिका, कल्प हाथ, व्याकरण मुख, निरुक्त कान, छन्द चरण और ज्योतिष नेत्र। ये छह विद्याएँ भाषा-विज्ञान, ध्वनि-विज्ञान और खगोल-गणित के प्राचीन भारतीय विकास की साक्षी हैं — पाणिनि का व्याकरण आज भी विश्व के भाषाविदों में अध्ययन का विषय है।
छह वेदांग
शिक्षा
स्वर-विज्ञान — वर्णों का शुद्ध उच्चारण, स्वर (उदात्त-अनुदात्त-स्वरित), मात्रा और बल। प्रातिशाख्य ग्रंथ इसी परंपरा के हैं। मंत्र की शक्ति शुद्ध उच्चारण से जुड़ी मानी गई, इसलिए यह विद्या सर्वप्रथम विकसित हुई।
कल्प
कर्मकांड-विधि — यज्ञ और संस्कारों की क्रम-बद्ध विधियाँ। इसके अंतर्गत श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र और शुल्बसूत्र आते हैं। शुल्बसूत्रों में वेदी-निर्माण की ज्यामिति है — प्राचीन भारतीय गणित का महत्वपूर्ण स्रोत।
व्याकरण
भाषा का शास्त्र — शब्द-रचना और वाक्य-विन्यास के नियम। पाणिनि की अष्टाध्यायी (लगभग 4,000 सूत्र) इसका शिखर है; पतंजलि का महाभाष्य और कात्यायन के वार्तिक इसकी व्याख्या-परंपरा हैं।
निरुक्त
शब्द-व्युत्पत्ति — वैदिक शब्दों के मूल अर्थ की खोज। यास्क का निरुक्त (निघंटु शब्द-सूची की व्याख्या) उपलब्ध प्राचीनतम ग्रंथ है — विश्व की प्रारंभिक शब्द-व्युत्पत्ति परंपराओं में गिना जाता है।
छन्द
छंद-शास्त्र — मंत्रों की मात्रा और पद्य-संरचना। गायत्री, अनुष्टुप्, त्रिष्टुप्, जगती आदि प्रमुख वैदिक छंद। पिंगल का छन्दःसूत्र आधार-ग्रंथ है; इसमें द्विआधारी गणना जैसी अवधारणाओं के बीज मिलते हैं।
ज्योतिष
काल-गणना का शास्त्र — यज्ञों का सही समय जानने हेतु सूर्य-चंद्र-नक्षत्रों की गति का अध्ययन। वेदांग ज्योतिष (लगध) प्रारंभिक ग्रंथ है। ध्यान रहे — वेदांग ज्योतिष मूलतः खगोल-गणित है; फलित ज्योतिष का विकास परवर्ती है।