सूत्र साहित्य
श्रौत, गृह्य, धर्म, शुल्ब — सूत्र-शैली के ग्रंथ
"सूत्र" का शाब्दिक अर्थ है धागा — न्यूनतम शब्दों में अधिकतम अर्थ पिरोने वाली रचना-शैली। मौखिक परंपरा में विशाल ज्ञान को स्मरणीय बनाने के लिए यह शैली विकसित हुई: "अल्पाक्षरम् असंदिग्धम्" (कम अक्षर, संदेह-रहित) इसका आदर्श कहा गया। वैदिक कल्प-वेदांग के अंतर्गत चार सूत्र-वर्ग आते हैं — श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र और शुल्बसूत्र; इसके अतिरिक्त दर्शनों के मूल ग्रंथ (ब्रह्मसूत्र, योगसूत्र, न्यायसूत्र आदि) भी इसी शैली में हैं। प्रत्येक वैदिक शाखा के अपने-अपने सूत्र-ग्रंथ रहे — जैसे आपस्तम्ब, आश्वलायन, पारस्कर, बौधायन।
चार सूत्र-वर्ग
श्रौतसूत्र
श्रुति-आधारित बड़े यज्ञों (अग्निहोत्र, सोमयाग आदि) की विधियाँ — जैसे आश्वलायन, बौधायन, कात्यायन श्रौतसूत्र।
गृह्यसूत्र
गृहस्थ के घरेलू संस्कार — विवाह, उपनयन, नामकरण आदि 16 संस्कारों की मूल विधियाँ यहीं से हैं; जैसे आपस्तम्ब, पारस्कर, आश्वलायन गृह्यसूत्र।
धर्मसूत्र
आचार-व्यवहार के प्रारंभिक नियम-ग्रंथ — गौतम, बौधायन, आपस्तम्ब, वसिष्ठ धर्मसूत्र; परवर्ती स्मृतियों के पूर्वज। ऐतिहासिक स्रोत रूप में अध्येय।
शुल्बसूत्र
यज्ञ-वेदी निर्माण की ज्यामिति — रज्जु (रस्सी) से माप। बौधायन शुल्बसूत्र में कर्ण-प्रमेय (समकोण त्रिभुज संबंध) का प्राचीन कथन मिलता है — भारतीय गणित-इतिहास का प्रसिद्ध प्रमाण।
ब्रह्मसूत्र और दर्शन-सूत्र
दर्शनों के मूल ग्रंथ भी सूत्र-शैली में हैं — ब्रह्मसूत्र (वेदान्त), योगसूत्र, न्यायसूत्र, वैशेषिक-सूत्र, मीमांसा-सूत्र, सांख्य-सूत्र। सूत्र इतने संक्षिप्त होते हैं कि भाष्य के बिना अर्थ खुलता नहीं — इसीलिए भारतीय ज्ञान-परंपरा "सूत्र-भाष्य-टीका" की त्रि-स्तरीय संरचना में विकसित हुई। यह संरचना ही विभिन्न संप्रदायों की व्याख्या-विविधता का आधार बनी।