सनातन ज्ञान
ज्ञान संसार
शास्त्र पुस्तकालय · षड्दर्शन

वैशेषिक दर्शन

पदार्थ-विज्ञान — परमाणु-सिद्धांत का प्राचीन दर्शन

वैशेषिक दर्शन जगत की रचना का विश्लेषण करता है — यह जानने का प्रयास कि सत्ता कितने प्रकार की है और भौतिक जगत किन इकाइयों से बना है। मूल ग्रंथ है महर्षि कणाद का वैशेषिक-सूत्र; प्रशस्तपाद का पदार्थधर्मसंग्रह इसकी प्रमुख व्याख्या है। "कणाद" नाम ही "कण" से जुड़ा है — इस दर्शन का परमाणुवाद प्रसिद्ध है: भौतिक द्रव्य अंततः अविभाज्य परमाणुओं से बने हैं, और सृष्टि परमाणुओं के संयोग से होती है। कालांतर में न्याय और वैशेषिक मिलकर "न्याय-वैशेषिक" संयुक्त परंपरा बन गए।

सात पदार्थ

द्रव्य

नौ द्रव्य — पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा, मन।

गुण

रूप, रस, गंध, स्पर्श, संख्या आदि 24 गुण।

कर्म

गति/क्रिया — उत्क्षेपण, अपक्षेपण आदि पाँच।

सामान्य

जाति/सामान्य धर्म — जिससे अनेक व्यक्तियों में एकता दिखती है।

विशेष

प्रत्येक नित्य द्रव्य की अंतिम विशिष्टता — इसी से दर्शन का नाम "वैशेषिक"।

समवाय

नित्य संबंध — जैसे वस्त्र और तंतु, गुण और द्रव्य का संबंध।

अभाव

न होने की सत्ता — परवर्ती परंपरा में जोड़ा गया सातवाँ पदार्थ।

परमाणुवाद

वैशेषिक के अनुसार पृथ्वी-जल-तेज-वायु के सूक्ष्मतम अविभाज्य कण "परमाणु" नित्य हैं। दो परमाणुओं से द्व्यणुक, तीन द्व्यणुकों से त्र्यणुक — इस क्रम से स्थूल जगत बनता है। सृष्टि-प्रलय परमाणुओं के संयोग-वियोग से समझाए गए हैं। यह विश्लेषण-दृष्टि प्राचीन भारतीय प्रकृति-चिंतन का उल्लेखनीय उदाहरण है — आधुनिक विज्ञान से तुलना करते समय ध्यान रहे कि संदर्भ और पद्धति भिन्न हैं।

मूल ग्रंथपरिचय उपलब्ध