सनातन ज्ञान
ज्ञान संसार
शास्त्र पुस्तकालय · षड्दर्शन

न्याय दर्शन

तर्क और प्रमाण का शास्त्र

न्याय दर्शन भारतीय तर्कशास्त्र की आधारशिला है। इसका मूल ग्रंथ है महर्षि गौतम (अक्षपाद) का न्याय-सूत्र, जिस पर वात्स्यायन का भाष्य प्रसिद्ध है। न्याय का प्रतिपाद्य है — सही ज्ञान (प्रमा) कैसे प्राप्त हो और गलत तर्क कैसे पहचाना जाए। इस दर्शन ने वाद-विवाद की जो व्यवस्थित पद्धति दी (पंचावयव न्याय-वाक्य, हेत्वाभास-विश्लेषण), वह शताब्दियों तक भारतीय शास्त्रार्थ-परंपरा की रीढ़ रही। 13वीं शताब्दी के बाद गंगेश उपाध्याय से "नव्य-न्याय" का विकास हुआ — विश्लेषण की ऐसी सूक्ष्म भाषा जिसकी तुलना आधुनिक तर्कशास्त्र से की जाती है।

चार प्रमाण

प्रत्यक्ष

इंद्रिय-जन्य सीधा ज्ञान।

अनुमान

चिह्न (हेतु) से निष्कर्ष — जैसे धुएँ से अग्नि का ज्ञान।

उपमान

सादृश्य से ज्ञान।

शब्द

आप्त (विश्वसनीय) वचन — वेद तथा विश्वसनीय वक्ता का कथन।

सोलह पदार्थ और पंचावयव

न्याय-सूत्र सोलह पदार्थों (प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धांत, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रहस्थान) की परीक्षा करता है। अनुमान का प्रसिद्ध पंचावयव रूप: प्रतिज्ञा (पर्वत पर अग्नि है), हेतु (क्योंकि धुआँ है), उदाहरण (जहाँ धुआँ, वहाँ अग्नि — जैसे रसोई), उपनय (यहाँ भी धुआँ है), निगमन (अतः अग्नि है)। हेत्वाभास (दोषपूर्ण हेतु) की पहचान न्याय की विशेष देन है।

नव्य-न्याय

गंगेश उपाध्याय (मिथिला) के तत्त्वचिंतामणि से आरंभ नव्य-न्याय ने अवच्छेदक, प्रतियोगी जैसी तकनीकी शब्दावली से विश्लेषण को अत्यंत सूक्ष्म बनाया। नवद्वीप (बंगाल) इसका प्रमुख केंद्र बना। यह परंपरा व्याकरण, धर्मशास्त्र और वेदान्त की व्याख्या-भाषा भी बनी।

मूल ग्रंथपरिचय उपलब्ध