उपवेद
आयुर्वेद, धनुर्वेद, गांधर्ववेद, स्थापत्यवेद — व्यावहारिक विद्याएँ
उपवेद वे व्यावहारिक विद्याएँ हैं जिन्हें परंपरा ने वेदों का "सहायक ज्ञान" माना — जीवन के भौतिक पक्ष को सँवारने वाली विद्याएँ। सूचियों में परंपरा-भेद मिलता है, पर सर्वाधिक प्रचलित गणना चार उपवेदों की है: आयुर्वेद (चिकित्सा), धनुर्वेद (युद्ध-कला), गांधर्ववेद (संगीत-नृत्य) और स्थापत्यवेद (वास्तु-शिल्प); कुछ परंपराएँ स्थापत्य के स्थान पर अर्थशास्त्र को गिनती हैं। यह वर्गीकरण दिखाता है कि सनातन दृष्टि में अध्यात्म और व्यावहारिक जीवन-कौशल परस्पर विरोधी नहीं, पूरक हैं।
चार उपवेद
आयुर्वेद
आरोग्य और दीर्घ-जीवन की विद्या; ऋग्वेद/अथर्ववेद से संबद्ध मानी जाती है। प्रमुख ग्रंथ — चरक संहिता (चिकित्सा), सुश्रुत संहिता (शल्य), अष्टांगहृदयम् (वाग्भट)। त्रिदोष (वात-पित्त-कफ) और दिनचर्या-ऋतुचर्या इसकी आधार-अवधारणाएँ हैं।
धनुर्वेद
शस्त्र-विद्या और युद्ध-कला; यजुर्वेद से संबद्ध। धनुष-बाण के साथ-साथ व्यूह-रचना, शस्त्र-प्रकार और योद्धा-धर्म (युद्ध-नीति) का विवेचन। स्वतंत्र ग्रंथ अल्प ही बचे हैं; महाभारत-अग्निपुराण में सामग्री मिलती है।
गांधर्ववेद
संगीत, नृत्य और नाट्य की विद्या; सामवेद से संबद्ध। भरत मुनि का नाट्यशास्त्र इस परंपरा का शिखर-ग्रंथ है — रस-सिद्धांत, ताल, स्वर और अभिनय का व्यवस्थित शास्त्र।
स्थापत्यवेद / अर्थशास्त्र
वास्तु-शिल्प, नगर-नियोजन और मंदिर-निर्माण की विद्या; अथर्ववेद से संबद्ध। मानसार, मयमतम् जैसे शिल्प-ग्रंथ। कुछ परंपराएँ यहाँ अर्थशास्त्र (राज्य-व्यवस्था, कौटिल्य) की गणना करती हैं — दोनों सूचियाँ प्रचलित हैं।
⚠️ उपवेदों की सूची और वेद-संबद्धता में ग्रंथ-भेद मिलता है; ऊपर प्रचलित मत दिया गया है।