तंत्र (परिचय)
शास्त्रीय परिचय — दीक्षा-परंपरा का अकादमिक अवलोकन
तंत्र भारतीय साधना-परंपराओं की एक विशाल और बहुधा गलत समझी गई धारा है। शास्त्रीय अर्थ में "तंत्र" वह ग्रंथ-वर्ग है जो देह, मंत्र, यंत्र और ध्यान को साधना का माध्यम बनाता है — इसका केंद्र-विचार है कि जगत शिव-शक्ति की अभिव्यक्ति है, अतः देह और संसार साधना-विरोधी नहीं, साधना के उपकरण हैं। तंत्र-परंपराएँ शैव, शाक्त, वैष्णव — तीनों धाराओं में मिलती हैं। महत्वपूर्ण: तंत्र मूलतः दीक्षा-परंपरा है — इसके विधान योग्य गुरु के सान्निध्य में ही अर्थ रखते हैं; इसी कारण इस पृष्ठ पर केवल शास्त्रीय-ऐतिहासिक परिचय है, कोई साधना-विधि नहीं।
ग्रंथ-परिवार (नाम-परिचय)
शैव-शाक्त तंत्र
भैरव-तंत्र वर्ग, श्रीविद्या परंपरा के ग्रंथ, कश्मीर शैव दार्शनिक साहित्य (जैसे अभिनवगुप्त का तंत्रालोक — 10वीं-11वीं शती) — दर्शन, सौंदर्यशास्त्र और साधना का समन्वय।
शाक्त उपासना-ग्रंथ
देवी-माहात्म्य (पुराण-अंतर्गत) शाक्त परंपरा का लोकप्रिय पाठ है; तांत्रिक शाक्त ग्रंथों की सूची विशाल है और अधिकांश केवल विशेषज्ञ-अध्ययन का विषय।
वैष्णव तांत्रिक धारा
पांचरात्र संहिताएँ तांत्रिक पद्धति की ही वैष्णव अभिव्यक्ति मानी जाती हैं — मंत्र, मंडल, न्यास जैसी साझा विधियाँ।
भ्रांतियाँ और वास्तविकता
लोक-प्रचलन में "तंत्र" शब्द जादू-टोने का पर्याय बन गया है — यह शास्त्रीय तंत्र का अत्यंत संकुचित और भ्रामक चित्र है। शास्त्रीय तंत्र-साहित्य का बड़ा भाग दर्शन (प्रत्यभिज्ञा, स्पंद), मंत्र-शास्त्र, मंदिर-विधान और ध्यान-योग है। साथ ही यह भी सत्य है कि कुछ धाराओं की विधियाँ गोपनीय और दीक्षा-सापेक्ष रही हैं — उन्हें बिना अधिकार-परंपरा के प्रस्तुत करना अनुचित होगा। इस पोर्टल की नीति: परिचय हाँ, प्रयोग-विधि नहीं।
⚠️ यह खंड केवल शैक्षिक-ऐतिहासिक परिचय है। साधना-विधियाँ जानबूझकर सम्मिलित नहीं की गई हैं — परंपरा में वे गुरु-सापेक्ष मानी गई हैं।