आगम शास्त्र
मंदिर, मूर्ति और उपासना की शास्त्र-परंपरा
आगम वे शास्त्र हैं जो मंदिर-निर्माण, मूर्ति-प्रतिष्ठा, पूजा-विधि, मंत्र, दीक्षा और साधना का व्यवस्थित विधान देते हैं। जहाँ वेद यज्ञ-केंद्रित हैं, वहीं आगम मंदिर-उपासना-केंद्रित — आज के अधिकांश बड़े मंदिरों की पूजा-पद्धतियाँ आगम-विधानों पर ही चलती हैं। आगम-परंपराएँ तीन प्रमुख धाराओं में विभाजित हैं: शैव आगम, वैष्णव आगम (पांचरात्र और वैखानस) तथा शाक्त परंपरा (तंत्र-ग्रंथ)। प्रत्येक आगम प्रायः चार पादों में होता है — ज्ञान (दर्शन), योग (साधना), क्रिया (निर्माण-प्रतिष्ठा) और चर्या (नित्य-पूजा-उत्सव)।
तीन धाराएँ
शैव आगम
परंपरागत गणना में 28 मूल शैव आगम (कामिक, कारण आदि) और उनके उपागम। दक्षिण की शैव सिद्धांत परंपरा तथा कश्मीर शैव परंपरा — दोनों आगम-आधारित हैं, दृष्टि-भेद के साथ। (शैव परंपरा-लेबल)
वैष्णव — पांचरात्र
नारायण/विष्णु-उपासना के आगम — संहिता-ग्रंथ (जैसे अहिर्बुध्न्य, जयाख्य, पाद्म संहिता); व्यूह-सिद्धांत और मंदिर-विधान। श्रीवैष्णव परंपरा में प्रतिष्ठित। (वैष्णव परंपरा-लेबल)
वैष्णव — वैखानस
विखनस ऋषि से जुड़ी वैदिक-रुझान वाली वैष्णव आगम-धारा; अनेक प्रसिद्ध विष्णु-मंदिरों की अर्चना-पद्धति इसी विधान से। (वैष्णव परंपरा-लेबल)
शाक्त परंपरा
देवी-उपासना की आगम/तंत्र-परंपरा — श्रीविद्या आदि धाराएँ; देवी को परम तत्व मानने वाला दर्शन। (शाक्त परंपरा-लेबल; विस्तृत परिचय तंत्र खंड में)
आगम और मंदिर-जीवन
मंदिर का स्थान-चयन, वास्तु-मान, मूर्ति के लक्षण, प्राण-प्रतिष्ठा, नित्य-नैमित्तिक पूजाएँ, उत्सव-रथयात्रा, प्रायश्चित्त — यह सब आगम-ग्रंथों में विधि-बद्ध है। दक्षिण भारत के मंदिरों में आज भी अर्चक-शिक्षा आगम-पाठशालाओं में होती है। आगम-साहित्य विशाल है और बड़ा भाग अभी भी पांडुलिपियों में असंपादित है — अनेक ग्रंथों का विवरण "सत्यापन लंबित" श्रेणी में ही रखना उचित है।