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शास्त्र पुस्तकालय · स्मृति-सूत्र

स्मृतियाँ

धर्मशास्त्र-ग्रंथ — ऐतिहासिक सामाजिक संहिताएँ

स्मृति का अर्थ है "स्मरण किया हुआ" — श्रुति (वेद) के बाद की वह ग्रंथ-परंपरा जिसमें ऋषियों ने अपने-अपने युग के अनुसार आचार, व्यवहार (विधि) और प्रायश्चित्त के नियम संकलित किए। स्मृतियाँ ऐतिहासिक दस्तावेज हैं — वे अपने रचना-काल के समाज की व्यवस्था दर्शाती हैं। परंपरा स्वयं मानती रही है कि स्मृतियाँ देश-काल-सापेक्ष हैं: प्रत्येक युग की अपनी स्मृति-व्यवस्था कही गई है और परस्पर विरोध की स्थिति में श्रुति को ही प्रमाण माना गया। आज इनका अध्ययन मुख्यतः ऐतिहासिक-सांस्कृतिक स्रोत के रूप में होता है, न कि वर्तमान सामाजिक व्यवस्था के विधान के रूप में।

प्रमुख स्मृतियाँ

मनुस्मृति

12 अध्याय, लगभग 2,684 श्लोक — सृष्टि, संस्कार, आश्रम-धर्म, राजधर्म, व्यवहार और प्रायश्चित्त। धर्मशास्त्र-परंपरा में व्यापक रूप से उद्धृत; इसकी सामाजिक व्यवस्था-संबंधी मान्यताओं पर आधुनिक काल में गंभीर पुनर्विचार और आलोचना हुई है — यह ऐतिहासिक स्रोत के रूप में प्रस्तुत है।

याज्ञवल्क्य स्मृति

तीन कांड — आचार, व्यवहार, प्रायश्चित्त; संक्षिप्त और व्यवस्थित शैली। विज्ञानेश्वर की "मिताक्षरा" टीका मध्यकालीन और ब्रिटिशकालीन हिंदू विधि का प्रमुख आधार बनी।

पराशर स्मृति

परंपरा में "कलियुग की स्मृति" कही गई — युग-अनुकूल सरल आचार-व्यवस्था पर बल; कृषि-जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि उल्लेखनीय।

नारद स्मृति

लगभग पूर्णतः व्यवहार (न्याय-विधि) पर केंद्रित — साक्ष्य, ऋण, संपत्ति-विवाद जैसे 18 विवाद-पद; प्राचीन भारतीय न्याय-प्रक्रिया का महत्वपूर्ण स्रोत।

आधुनिक संदर्भ

स्मृति-साहित्य को समझते समय तीन बातें ध्यान रखने योग्य हैं: (1) स्मृतियाँ अनेक हैं और परस्पर भिन्न मत रखती हैं — कोई एक "अंतिम" संहिता नहीं; (2) परंपरा में देश-काल के अनुसार निर्णय (निबंध-ग्रंथ, परिषद्-व्यवस्था) का स्थान सदा रहा; (3) वर्तमान भारतीय समाज और विधि संविधान से शासित हैं। इस खंड का उद्देश्य ऐतिहासिक ज्ञान-परंपरा का परिचय है, किसी सामाजिक व्यवस्था का समर्थन नहीं।

ऐतिहासिक स्रोतपरिचय उपलब्ध