सांख्य दर्शन
पुरुष-प्रकृति विवेक — तत्वों की गणना का दर्शन
सांख्य प्राचीनतम भारतीय दर्शनों में गिना जाता है — "सांख्य" का अर्थ है गणना/विवेक-ज्ञान। इसके प्रवर्तक महर्षि कपिल माने जाते हैं; उपलब्ध आधार-ग्रंथ ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिका (लगभग 72 कारिकाएँ) है। सांख्य द्वैतवादी है: सत्ता के दो मूल तत्व हैं — पुरुष (चेतन साक्षी) और प्रकृति (जड़ मूल-कारण)। प्रकृति के तीन गुणों (सत्व-रजस्-तमस्) की साम्यावस्था भंग होने से 23 तत्वों का क्रम-विकास होता है — कुल 25 तत्व। गीता, पुराणों और आयुर्वेद पर सांख्य की तत्व-योजना का गहरा प्रभाव है; योग दर्शन इसी की साधना-पद्धति माना जाता है।
25 तत्व
पुरुष + प्रकृति; प्रकृति से महत् (बुद्धि) → अहंकार → अहंकार से मन, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा पाँच तन्मात्राएँ → तन्मात्राओं से पाँच महाभूत (आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी)। यह तत्व-सूची भारतीय चिंतन में इतनी व्यापक हुई कि पुराणों की सृष्टि-कथाएँ और आयुर्वेद का शरीर-विज्ञान इसी ढाँचे पर खड़े हैं।
मूल अवधारणाएँ
त्रिगुण
सत्व (प्रकाश-संतुलन), रजस् (गति-क्रिया), तमस् (जड़ता-आवरण) — प्रकृति के तीन गुण, जिनके घटते-बढ़ते अनुपात से समस्त विविधता।
सत्कार्यवाद
कार्य अपने कारण में पहले से सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहता है — जैसे तिल में तेल। परिणामवाद की आधार-धारणा।
पुरुष-बहुत्व
सांख्य में पुरुष (चेतन) अनेक हैं — प्रत्येक जीव का साक्षी चैतन्य स्वतंत्र।
कैवल्य
पुरुष-प्रकृति के भेद का साक्षात्कार (विवेक-ख्याति) होने पर पुरुष की स्वरूप-स्थिति — यही सांख्य का लक्ष्य है।
⚠️ शास्त्रीय सांख्य ईश्वर-प्रश्न पर मौन/अनीश्वरवादी माना जाता है; परवर्ती सेश्वर-सांख्य (योग) ईश्वर को स्वीकारता है — दोनों धाराएँ परंपरा में मान्य रही हैं।