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मंत्र — गहन अध्ययन

महामृत्युंजय मंत्र

वैदिक मंत्र (ऋग्वैदिक सूक्त-मंत्र; रुद्र/त्र्यम्बक)

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

Om Tryambakam Yajamahe Sugandhim Pushtivardhanam, Urvarukamiva Bandhanan Mrityor Mukshiya Mamritat

मूल ग्रंथवैदिक मंत्र (ऋग्वैदिक सूक्त-मंत्र; रुद्र/त्र्यम्बक)

⏱️ एक मिनट में जानें

महामृत्युंजय मंत्र ऋग्वेद (7.59.12) का मंत्र है, जो यजुर्वेद की संहिताओं में भी मिलता है। इसमें त्र्यम्बक — तीन नेत्रों वाले रुद्र — का यजन है, जो "सुगन्धि" (जीवन को सुरभित करने वाले) और "पुष्टिवर्धन" (पोषण बढ़ाने वाले) हैं। उपमा सुंदर है: जैसे पका हुआ उर्वारुक (खरबूजा/ककड़ी) अपनी बेल से सहज ही छूट जाता है, वैसे ही हम मृत्यु के बंधन से छूटें — पर "अमृत" से नहीं। यह मृत्यु-भय से ऊपर उठने की प्रार्थना है, मृत्यु टालने का दावा नहीं। शैव परंपरा में इसका जप विशेष श्रद्धा से होता है।

📖 विस्तार से समझें

देवता/विषय: त्र्यम्बक (रुद्र/शिव)

ऋषि: वसिष्ठ (ऋग्वेद 7.59 के द्रष्टा — मूल ग्रंथ की अनुक्रमणी परंपरा)

छन्द: अनुष्टुप् (अनुक्रमणी परंपरा)

परंपरा: शैव परंपरा में विशेष आदर; वैदिक स्वाध्याय में सर्व-सामान्य

पदच्छेद

ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टि-वर्धनम्। उर्वारुकम् इव बन्धनात् मृत्योः मुक्षीय मा अमृतात्॥

शब्दार्थ (पद-पद अर्थ)

त्र्यम्बकम्तीन नेत्रों वाले (रुद्र) को — त्रि+अम्बक
यजामहेहम यजन/पूजन करते हैं
सुगन्धिम्सुगन्धयुक्त — जिनकी कीर्ति/उपस्थिति सुरभि की तरह फैलती है
पुष्टि-वर्धनम्पुष्टि (पोषण, समृद्धि) बढ़ाने वाले को
उर्वारुकम् इवजैसे पका खरबूजा/ककड़ी
बन्धनात्बंधन से (बेल के डंठल से)
मृत्योः मुक्षीयमृत्यु से मैं मुक्त होऊँ
मा अमृतात्अमृत (अमरत्व/मोक्ष) से नहीं (छूटूँ)

सरल अनुवाद

हम तीन नेत्रों वाले, सुगन्धित, पोषण बढ़ाने वाले रुद्र का यजन करते हैं। जैसे पका खरबूजा बेल से सहज छूट जाता है, वैसे हम मृत्यु के बंधन से छूटें — अमृतत्व से नहीं।

विस्तृत भावार्थ

इस मंत्र की आत्मा उसकी उपमा में है। उर्वारुक — खरबूजा या ककड़ी — जब कच्चा होता है, तो बेल से जबरदस्ती तोड़ना पड़ता है; पर पक जाने पर वह अपने-आप, बिना संघर्ष, डंठल से अलग हो जाता है। मंत्र यही माँगता है: मृत्यु हमारे लिए कच्चे फल का टूटना न हो — भय, प्रतिरोध और अधूरापन लिए — बल्कि पके फल का सहज छूटना हो। यह मृत्यु को टालने की नहीं, मृत्यु के प्रति सम्बन्ध बदलने की प्रार्थना है।

दूसरा सूक्ष्म बिंदु "मा अमृतात्" में है — "अमृत से नहीं।" साधक कहता है: मुझे मरण-धर्मा बंधनों से छुड़ाओ, पर उस अमृतत्व से मत छुड़ाना जो मेरा वास्तविक स्वरूप है। वैदिक दृष्टि में अमृतत्व केवल "न मरना" नहीं; वह पूर्णता, मोक्ष, आत्मस्वरूप में स्थिति का संकेत है। इस तरह एक ही पंक्ति में मृत्यु और अमरता — दोनों के प्रति साधक की स्पष्ट दृष्टि आ जाती है।

त्र्यम्बक को "सुगन्धि" और "पुष्टिवर्धन" कहना भी अर्थपूर्ण है। रुद्र — जो वेदों में एक ओर भयकारी शक्ति हैं — यहाँ जीवन को सुरभित और पुष्ट करने वाले रूप में स्मरण किए जाते हैं। परंपरा इससे यह भाव लेती है कि जिस शक्ति से हम डरते हैं, वही, सम्यक् दृष्टि से देखने पर, पोषक भी है। मृत्यु का देवता ही जीवन का रक्षक है — यह विरोधाभास नहीं, दृष्टि का परिपक्व होना है।

क्या यह मंत्र रोग या मृत्यु टालता है? शास्त्र ऐसा कोई वचन नहीं देता, और यह पृष्ठ भी नहीं देता। परंपरा में इसे रोगियों के निकट, संकट के समय, या नियमित जप में इसलिए पढ़ा जाता है कि यह भय की जगह धैर्य, और पकड़ की जगह समर्पण जगाता है। रोग में औषधि और चिकित्सक का स्थान यह मंत्र नहीं लेता; वह मन को वह भूमि देता है जिस पर धैर्यपूर्वक खड़ा हुआ जा सके। यही इसका परंपरागत, ईमानदार अर्थ है।

उच्चारण मार्गदर्शन

  • त्र्यम्-ब-कम् — आरम्भ का संयुक्ताक्षर "त्र्य" (त्+र्+य) धीरे अभ्यास करें।
  • उर्-वा-रु-क-मि-व — संधि तोड़कर पहले टुकड़ों में, फिर जोड़कर।
  • मृत्योर्-मुक्षीय — "क्षी" दीर्घ; "मामृतात्" = मा + अमृतात् (मा का अर्थ यहाँ निषेध है — इसे "मुझे अमृत से" न समझें)।
  • वैदिक स्वर (उदात्त-अनुदात्त) के साथ पाठ की शुद्ध विधि गुरु-मुख से ही सीखी जाती है; बिना स्वर के श्रद्धा-पाठ भी परंपरा में सामान्य रूप से प्रचलित है।

परंपरागत प्रयोग

  • शैव परंपरा में नियमित जप; श्रावण मास और महाशिवरात्रि पर विशेष (सम्प्रदाय/क्षेत्रीय परंपरा)।
  • रोगी के कल्याण की भावना से परिजनों द्वारा जप (लोकपरंपरा) — औषधि/चिकित्सा का विकल्प नहीं।
  • रुद्राभिषेक आदि विधियों में पुरोहित-परंपरा से।

ये परंपरागत प्रसंग हैं — कोई भी प्रयोग "सबके लिए अनिवार्य" नहीं है।

जप-संख्या

कुछ परंपराओं में 11, 21, 27 या 108 आवृत्तियाँ प्रचलित हैं; संख्या और विधि परिवार, गुरु या सम्प्रदाय पर निर्भर करती है।

आध्यात्मिक भाव

  • परंपरा में इसे मृत्यु-भय से ऊपर उठने और मुक्ति के चिंतन से जोड़ा जाता है
  • समर्पण और धैर्य का भाव

🔬 गहन अध्ययन

स्रोत-विवेचन

मूल ग्रंथ: ऋग्वेद 7.59.12; तैत्तिरीय संहिता 1.8.6; वाजसनेयि संहिता 3.60। भाष्य परंपरा: सायण-भाष्य। "महामृत्युंजय" संज्ञा और जप-विधियाँ परवर्ती पौराणिक-आगमिक परंपरा से (परंपरागत पाठ)।

स्रोत-लेबल: मूल ग्रंथ

स्रोत-विवेचन

यह मंत्र ऋग्वेद मण्डल 7, सूक्त 59, मंत्र 12 है (वसिष्ठ-मण्डल)। यही मंत्र कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता (1.8.6.2 क्षेत्र) और शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयि संहिता (3.60) में भी संकलित है — इसीलिए इसे "यजुर्वेदीय" भी कहा जाता है; दोनों कथन सही हैं (मूल ग्रंथ)। रुद्राष्टाध्यायी और महामृत्युंजय-जप की विधियाँ परवर्ती कर्मकाण्ड परंपरा की हैं (परंपरागत पाठ)।

"महामृत्युंजय" नाम स्वयं वैदिक संहिता में नहीं है — यह परवर्ती परंपरा की संज्ञा है, जो पुराण-आगम धारा में रूढ़ हुई। वैदिक अनुक्रमणी परंपरा में सूक्त 7.59 के ऋषि वसिष्ठ हैं; अन्तिम मंत्र के देवता त्र्यम्बक/रुद्र माने जाते हैं (भाष्य परंपरा — सायण)।

संजीवनी-कथा और परंपरा

पौराणिक परंपरा (शिव पुराण आदि) में इस मंत्र को मृत्युंजय-विद्या के रूप में शुक्राचार्य, मार्कण्डेय आदि कथाओं से जोड़ा गया है — ये कथाएँ मंत्र की महिमा का पौराणिक स्तर हैं, ऋग्वैदिक मूल का अंग नहीं (पौराणिक परंपरा; कथा-सन्दर्भ भिन्न-भिन्न पुराणों में भिन्न रूप में मिलते हैं)। श्रद्धालु इन्हें श्रद्धा-कथा के रूप में पढ़ें, ऐतिहासिक दावे के रूप में नहीं।

⚠️ सावधानी

  • यह मंत्र रोग-निवारण या मृत्यु-निवारण की गारंटी नहीं है; गंभीर रोग में चिकित्सक की सलाह सर्वोपरि है।
  • वैदिक स्वर-सहित विधिवत् जप सीखना हो तो योग्य वैदिक आचार्य का मार्गदर्शन लें।

अंतिम समीक्षा: 2026-07-25 · संस्करण 1.0

समीक्षा स्थिति: आचार्य-समीक्षा लंबित (सामग्री-लेखन: संपादकीय)

अनुवाद स्थिति (en): मशीन अनुवाद — मानव संपादन लंबित

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