अन्नपूर्णा स्तुति
स्तोत्र-अंश (शंकराचार्य-आरोपित अन्नपूर्णा स्तोत्र)
अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे। ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥
Annapurne Sadapurne Shankara-prana-vallabhe, Jnana-vairagya-siddhyartham Bhiksham Dehi Cha Parvati
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"अन्नपूर्णे सदापूर्णे..." अन्नपूर्णा स्तोत्र का समापन-श्लोक है, जो परंपरा से आदि शंकराचार्य की रचना माना जाता है। अन्नपूर्णा — "अन्न से पूर्णा" — पार्वती का वह रूप हैं जो काशी में अन्न-दात्री देवी रूप में पूजित हैं। श्लोक की माँग ध्यान देने योग्य है: भिक्षा माँगी गई है, पर धन या भोग की नहीं — "ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए" भिक्षा। अन्न माँगते हुए भी दृष्टि ज्ञान पर — यही इस श्लोक की विलक्षणता है।
📖 विस्तार से समझें
देवता/विषय: अन्नपूर्णा (पार्वती)
परंपरा: काशी की अन्नपूर्णा परंपरा; अन्न-कृतज्ञता की गृह-परंपरा
पदच्छेद
अन्नपूर्णे सदा-पूर्णे शङ्कर-प्राण-वल्लभे। ज्ञान-वैराग्य-सिद्धि-अर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥
शब्दार्थ (पद-पद अर्थ)
| अन्नपूर्णे | हे अन्न से परिपूर्णा |
| सदापूर्णे | हे सदा पूर्ण रहने वाली — जिनका भण्डार रीतता नहीं |
| शङ्करप्राणवल्लभे | शंकर (शिव) की प्राण-प्रिय |
| ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थम् | ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए |
| भिक्षां देहि | भिक्षा दीजिए |
| पार्वति | हे पार्वती |
सरल अनुवाद
हे सदा-पूर्णा अन्नपूर्णा, शिव-प्राणप्रिया पार्वती! ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए मुझे भिक्षा दीजिए।
विस्तृत भावार्थ
काशी की परंपरागत कथा इस श्लोक की पृष्ठभूमि है: स्वयं शिव भिक्षुक रूप में अन्नपूर्णा के सम्मुख भिक्षा-पात्र लिए खड़े होते हैं। संकेत गहरा है — वैराग्य के चरम प्रतीक (शिव) भी अन्न के लिए गृहिणी-रूपा देवी के आगे झुकते हैं; अर्थात् देह जब तक है, अन्न की मर्यादा सबके लिए है — योगी के लिए भी। अन्न को तुच्छ कहकर अध्यात्म नहीं होता; अन्न के प्रति कृतज्ञता से होता है।
श्लोक में "ज्ञान-वैराग्य" के लिए भिक्षा माँगना दो स्तरों को एक कर देता है — पेट का अन्न और आत्मा का अन्न। तैत्तिरीय उपनिषद् की "अन्नं ब्रह्मेति" (अन्न ही ब्रह्म है) दृष्टि यहाँ भक्ति-काव्य के रूप में लौटती है: अन्न पहला ब्रह्म-रूप है जिससे मनुष्य का परिचय होता है, और अन्न-दान परंपरा में महादान गिना गया। इसीलिए भोजन से पूर्व इस श्लोक के पाठ की गृह-परंपरा बनी — कौर उठाने से पहले एक क्षण की कृतज्ञता।
रचयिता-प्रश्न पर ईमानदारी: अन्नपूर्णा स्तोत्र परंपरा से शंकराचार्य को आरोपित है, पर आधुनिक विद्वत् अध्ययन शंकर-नाम से चली अनेक स्तोत्र-रचनाओं के कर्तृत्व को अनिश्चित मानता है (सत्यापन लंबित)। परंपरा-आरोपण और प्रमाणित कर्तृत्व का यह भेद दर्ज रखना ही शुद्ध पद्धति है — पाठ की सुन्दरता और उपयोगिता इससे अप्रभावित है।
उच्चारण मार्गदर्शन
- ✦सिद्ध्यर्थं — सिद्-ध्यर्-थं; संयुक्ताक्षर धीरे साधें।
- ✦"पार्वति" सम्बोधन है — अन्त्य इ ह्रस्व।
परंपरागत प्रयोग
- ✦भोजन से पूर्व कृतज्ञता-पाठ (गृह-परंपरा)।
- ✦अन्नक्षेत्र/भण्डारा परंपरा में (लोकपरंपरा)।
- ✦काशी अन्नपूर्णा दर्शन एवं अन्नकूट पर्व (क्षेत्रीय परंपरा)।
ये परंपरागत प्रसंग हैं — कोई भी प्रयोग "सबके लिए अनिवार्य" नहीं है।
आध्यात्मिक भाव
- ✦अन्न के प्रति कृतज्ञता
- ✦ज्ञान और वैराग्य की भावना
🔬 गहन अध्ययन
स्रोत-विवेचन
अन्नपूर्णा स्तोत्र (प्रायः 12 श्लोक) — परंपरा से आदि शंकराचार्य-आरोपित; कर्तृत्व पर आधुनिक विद्वत् मत अनिश्चित (सत्यापन लंबित)। उपनिषद्-पृष्ठभूमि: तैत्तिरीय 3.2 (अन्नं ब्रह्मेति — मूल ग्रंथ)।
स्रोत-लेबल: परंपरागत पाठ (आरोपित कर्तृत्व); सत्यापन लंबित
अंतिम समीक्षा: 2026-07-25 · संस्करण 1.0
समीक्षा स्थिति: आचार्य-समीक्षा लंबित (सामग्री-लेखन: संपादकीय)
अनुवाद स्थिति (en): मशीन अनुवाद — मानव संपादन लंबित