सनातन ज्ञान
ज्ञान संसार
शास्त्र पुस्तकालय · षड्दर्शन

मीमांसा दर्शन

कर्म-मीमांसा — वैदिक कर्म और धर्म का विश्लेषण

मीमांसा (पूर्व-मीमांसा) छह आस्तिक दर्शनों में से एक है, जिसका केंद्र है — वेदों के कर्मकांड का व्यवस्थित विश्लेषण। "मीमांसा" का अर्थ ही है गहन विचार। इस दर्शन का मूल ग्रंथ है जैमिनि का मीमांसा-सूत्र (लगभग 2,700 सूत्र) — सूत्र-संख्या की दृष्टि से दर्शन-सूत्रों में विशाल। शबर स्वामी का भाष्य, तथा कुमारिल भट्ट और प्रभाकर की व्याख्या-परंपराएँ इसकी दो प्रमुख धाराएँ बनीं। मीमांसा ने वाक्य-अर्थ-निर्णय के जो नियम विकसित किए, वे परवर्ती काल में धर्मशास्त्र और भारतीय विधि-चिंतन की व्याख्या-पद्धति के आधार बने।

मूल ग्रंथ और आचार्य

मीमांसा-सूत्र (जैमिनि)

12 अध्यायों में वैदिक कर्म के प्रामाण्य, विधि-निषेध और वाक्यार्थ-निर्णय का शास्त्र।

शाबर भाष्य

शबर स्वामी की प्राचीन व्याख्या — परवर्ती समस्त मीमांसा-चिंतन का आधार।

कुमारिल भट्ट और प्रभाकर

दो व्याख्या-धाराएँ (भाट्ट और प्राभाकर) — प्रमाण-संख्या और ज्ञान-सिद्धांत में परस्पर मतभेद।

मूल अवधारणाएँ

धर्म का लक्षण

"चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः" — वेद-विधि से ज्ञात कर्तव्य ही धर्म; धर्म-ज्ञान का प्रमाण वेद है।

वेद-अपौरुषेयता

मीमांसा के अनुसार वेद नित्य और अपौरुषेय (किसी व्यक्ति-रचित नहीं) हैं; शब्द-अर्थ संबंध भी नित्य।

अपूर्व

यज्ञ-कर्म और उसके फल के बीच की अदृश्य कड़ी — कर्म की सूक्ष्म शक्ति की अवधारणा।

व्याख्या-नियम

श्रुति-लिंग-वाक्य-प्रकरण आदि प्रमाण-क्रम; विधि, अर्थवाद, नामधेय का भेद — पाठ-व्याख्या की व्यवस्थित पद्धति।

मूल ग्रंथपरिचय उपलब्ध