सनातन ज्ञान
ज्ञान संसार
12 ज्योतिर्लिंग

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

परंपरागत सूची में 12वाँ ज्योतिर्लिंग — वेरुल (एलोरा के निकट), छत्रपति संभाजीनगर (महाराष्ट्र)

⏱️ एक मिनट में जानें

घृष्णेश्वर — वेरुल (एलोरा), छत्रपति संभाजीनगर जिला, महाराष्ट्र — परंपरागत द्वादश-सूची का अन्तिम ज्योतिर्लिंग है। कथा भक्तिन घुश्मा (घृष्णा) की है: निःसन्तान पति की दूसरी पत्नी बनी घुश्मा नित्य 101 पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजती और सरोवर में विसर्जित करती; ईर्ष्या में बड़ी बहन (सौत) ने उसके पुत्र का वध कर दिया — पर घुश्मा विचलित हुए बिना नित्य-पूजा करती रही; शिव प्रकट हुए, पुत्र जीवित मिला, और घुश्मा की प्रार्थना पर "घृष्णेश्वर" रूप में स्थित हुए। वर्तमान मन्दिर अहिल्याबाई होल्कर (18वीं शती) का पुनर्निर्माण है — लाल पाषाण, शिल्प-समृद्ध शिखर। विश्व-धरोहर एलोरा गुफाओं (कैलाश मन्दिर!) से मात्र किलोमीटर-भर दूरी — ज्योतिर्लिंग और शैलकृत कैलाश का यह पड़ोस अद्वितीय है।

📖 विस्तार से समझें

पौराणिक कथा (शिव पुराण परंपरा)

देवगिरि-क्षेत्र के ब्राह्मण सुधर्मा की निःसन्तान पत्नी सुदेहा ने अपनी छोटी बहन घुश्मा का विवाह पति से करा दिया। शिवभक्त घुश्मा नित्य 101 पार्थिव लिंग बना पूजती। पुत्र-जन्म से सुदेहा की ममता ईर्ष्या बनी — उसने युवक पुत्र का वध कर शव सरोवर में फेंका। प्रातः घर शोक में डूबा, पर घुश्मा ने पहले नित्य-पूजा पूरी की; विसर्जन-सरोवर से पुत्र जीवित निकला और शिव प्रकट हुए। दण्ड माँगने पर घुश्मा ने बहन के लिए क्षमा माँगी; प्रसन्न शिव उसकी प्रार्थना पर "घृष्णेश्वर" (घुश्मेश्वर) रूप में स्थित हुए (शिव पुराण, कोटिरुद्र संहिता — पौराणिक परंपरा)।

यह द्वादश-कथाओं में विरल कथा है जिसकी नायिका गृहस्थ स्त्री है — न ऋषि, न राजा। उसके दो शिखर-गुण: शोक में भी नियम-निष्ठा (भक्ति भावुकता नहीं, स्थिरता है), और हत्यारिन के लिए क्षमा-याचना — क्षमा का ऐसा चरम उदाहरण पुराण-कथाओं में विरल है। "अन्तिम" ज्योतिर्लिंग की कथा का सन्देश मानो पूरी माला का उपसंहार है: साधना का अन्त क्षमा में है।

मन्दिर और एलोरा-पड़ोस

मध्यकालीन ध्वंस के बाद मन्दिर के पुनर्निर्माण-चक्र मराठा-काल में हुए — छत्रपति शिवाजी के पितामह मालोजी भोसले (16वीं शती उत्तरार्ध) का जीर्णोद्धार और अन्ततः देवी अहिल्याबाई होल्कर (18वीं शती) का वर्तमान भव्य निर्माण (ऐतिहासिक विवरण)। लाल पाषाण का मन्दिर दशावतार-शिल्प, अलंकृत स्तम्भ-सभामण्डप और शिखर-कलश से मण्डित है; गर्भगृह में पूर्वाभिमुख लिंग।

मन्दिर से किलोमीटर-भर पर एलोरा की विश्व-धरोहर गुफाएँ हैं — जिनमें गुफा-16 "कैलाश मन्दिर" एक ही चट्टान से ऊपर-से-नीचे तराशा गया विश्व का सबसे बड़ा शैलकृत मन्दिर है (राष्ट्रकूट, 8वीं शती — पुरातात्त्विक/ऐतिहासिक तथ्य)। ज्योतिर्लिंग-यात्रा यहाँ कला-यात्रा से मिल जाती है: श्रद्धा ने जो कथा में रचा, शिल्पियों ने वही पत्थर में — दोनों एक ही भक्ति के दो हस्ताक्षर।

पर्व एवं दर्शन-परंपरा

  • महाशिवरात्रि — मुख्य पर्व एवं मेला।
  • श्रावण-मास — सोमवार विशेष; पार्थिव-लिंग पूजन की घुश्मा-स्मृति परंपरा (लोक)।
  • त्रिपुरी पूर्णिमा दीप-परंपरा (क्षेत्रीय)।

🔬 गहन अध्ययन

भूगोल और यात्रा

स्थान: वेरुल ग्राम, छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व औरंगाबाद) जिला, महाराष्ट्र; नगर से ~30 किमी, एलोरा गुफाओं से ~1 किमी। दौलताबाद दुर्ग-मार्ग पर। वायु/रेल: छत्रपति संभाजीनगर।

मिथक-बनाम-इतिहास / परंपरा-भेद

नाम-रूप "घृष्णेश्वर/घुश्मेश्वर/घुसृणेश्वर" पाठ-भेद हैं — एक ही तीर्थ के। गर्भगृह-प्रवेश के वस्त्र-नियम (पुरुषों हेतु उत्तरीय-रहित प्रवेश आदि) मन्दिर-व्यवस्था की परंपरा हैं (संस्थागत जानकारी)।

कथाएँ शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता) की परंपरा से — श्रद्धा-कथा के रूप में; ऐतिहासिक विवरण अभिलेख-आधारित। अंतिम समीक्षा: 2026-07-25 · आचार्य-समीक्षा लंबित।

🔗 संबंधित सामग्री